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शेरो-शायरी



सितम हवा का अगर तेरे तन को रास नहीं
कहां से लाऊं वो झोंका जो मेरे पास नहीं
- वजीर आगा





उम्र जलवों में बसर हो ये जरूरी तो नहीं
हर शब-ए-गम की सहर हो ये जरूरी तो नहीं
- खामोश देहलवी





आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझ में
और फिर मानना पड़ता है कि खुदा है मुझ में
- कृष्णबिहारी नूर





कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिजरां छोड़कर
चल बसा वो आज सब हस्ती का सामां छोड़कर
- इब्राहीम जौक





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