नगर सेठ और राजा का नौकर - पंचतंत्र की एक कहानी | A Panchatantra Story in Hindi

 वर्धमान नगर में आभूषणों का एक बड़ा कारोबारी रहता था, नाम था दन्तिल सेठ. वह बड़ा व्यवहारकुशल था और व्यापार भी पूरी नैतिकता के साथ करता था. अपने इन्हीं गुणों के कारण नगर में उसका बड़ा सम्मान था. दन्तिल सेठ के व्यवहार से राजा भी बहुत प्रसन्न रहते थे और उन्होंने उसे अपने पारिवारिक मित्र का दर्जा दे रखा था. अर्थात दन्तिल सेठ की पहुँच रनिवास के भीतर तक थी. 

एक बार दन्तिल सेठ ने अपनी बेटी का ब्याह किया तो उसमें नगर के सभी गणमान्य व्यक्तियों के साथ-साथ राजपरिवार के सदस्य भी सम्मिलित हुए. सेठ ने यथायोग्य सबका सत्कार-सम्मान किया और ब्याह ख़ुशी ख़ुशी संपन्न हो गया, बस एक छोटी सी गड़बड़ के सिवा. 

दरअसल राजा का गोरम्भ नामक एक नौकर था जो रनिवास में काम करता था. दन्तिल सेठ के विवाह में राजपरिवार के सदस्यों के साथ वह भी सम्मिलित हुआ था. अब चूंकि वह राजा का नौकर था, रनिवास में काम करने के कारण रानियों का मुंहलगा था, तो स्वयं को अन्य नौकरों की अपेक्षा कुछ ऊंचे दर्जे का मानता था. 

इसी कारण उसकी अपेक्षा थी कि उसका सम्मान भी बढ़चढ़ कर हो, खुद दन्तिल सेठ उसका स्वागत-सत्कार करें . परन्तु था तो वह एक नौकर ही, इसलिए सम्मान भी उसी हिसाब का हुआ.  इसी चक्कर में उसका सेठ के नौकरों से झगड़ा भी हो गया. 

बस, गोरम्भ ने अपने आपको अपमानित मान लिया और सेठ से इसका बदला लेने की सोचने लगा. आखिर राजा का नौकर था वह, वो भी रनिवास में काम करने वाला ! कोई मामूली बात तो नहीं थी न !

एक दिन प्रातःकाल के समय राजा साहब अर्धनिद्रा की अवस्था में थे. गोरम्भ उसी समय उनके शयनकक्ष में आया और बड़बड़ाने लगा - "दन्तिल सेठ का यह दुस्साहस कि वह महारानी का आलिंगन करे. राम राम राम ! क्या ज़माना आ गया है ! लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं."

राजा के कानों में गोरम्भ की बडबडाहट पड़ गई. दरअसल गोरम्भ ने कहा ही इस प्रकार था ताकि राजा साहब सुन लें. राजा चौंककर उठा और सचेत होकर बोला - "क्या सचमुच दन्तिल सेठ ने रानी का आलिंगन किया ?"

राजा की आवाज सुनते ही गोरम्भ ने घबराने का अभिनय किया और बोला - "क्या मैंने कुछ कहा है महाराज ... नहीं नहीं महाराज मैंने तो कुछ नहीं कहा ... आप शायद सपना देख रहे होंगे ?"

राजा ने मन ही मन विचार किया - "शायद गोरम्भ के मुख से सत्य निकल गया है. अब वह डर के कारण छिपा रहा है. दाल में कुछ काला अवश्य है. स्त्री का भरोसा ही क्या ?"

गोरम्भ से तो राजा ने उस समय कुछ नहीं कहा लेकिन दन्तिल सेठ और रानी को लेकर उनके मन में संदेह जरूर बैठ गया. 

उसी दिन से उसने सेठ का रनिवास में आनाजाना बंद करवा दिया. दन्तिल सेठ ने जब यह सुना तो वह आश्चर्य में पड़ गया. राजा के व्यवहार में आये परिवर्तन को भी वह ताड़ गया. इस परिवर्तन के कारण को ढूँढने की सेठ ने बहुत कोशिश की परन्तु उसकी समझ में कुछ नहीं आया. 

ऐसे ही एक दिन सेठ राजा की नाराजी की वजह समझने की उधेड़बुन में था कि अकस्मात् गोरम्भ उस की नज़रों के सामने होकर गुजरा तो सेठ को बेटी के ब्याह में उसके अपमान की बात याद आ गई. सेठ ने उसे बहलाया और घर ले आया. अपने नौकरों के व्यवहार के लिए खेद प्रकट किया और उसे ढेर सारे वस्त्र आभूषण उपहार में देकर सम्मान सहित विदा किया. 

हालांकि इतना सब करने के बाद भी सेठ को ये पता नहीं चल सका कि राजा उससे नाराज क्यों हैं, किन्तु गोरम्भ संतुष्ट जरूर हो गया. चलते चलते इतना भी कह आया कि वह राजा के यहाँ सेठ को उनका सम्मान वापस दिलवा कर रहेगा. 

अगले दिन राजा जब उसी दिन की तरह अर्धनिद्रित अवस्था में थे, तभी गोरम्भ बडबडाया - "हमारे राजा साहब को देखो, शौच करते समय ककड़ी खाते हैं ?"

राजा ने जैसे ही सुना, तुरंत सचेत होकर कड़क आवाज में बोला - "क्यों रे, मैंने शौच करते वक़्त कब ककड़ी खाई ... तू मुझे शौच करते हुए देखता है क्या ?"

गोरम्भ पूर्ववत घबराने और हडबडाने का अभिनय करते हुए बोला - "महाराज मैंने कुछ कहा क्या ? मैंने तो कुछ नहीं कहा .... आपने सपना देखा होगा शायद !"

अब राजा सोच में पड़ गया. "इस मूर्ख को तो कुछ भी बडबडाने की आदत जान पड़ती है !! या फिर शायद मैं ही सपना देख रहा होऊं ! जो भी हो लगता है रानी और सेठ के आलिंगन की बात भी मेरे शौच के समय ककड़ी खाने की तरह ही झूठ है. कहाँ इस मूर्ख के चक्कर में मैं नगर के सबसे धनी व्यापारी की मित्रता को दांव पर लगा बैठा था."

फिर क्या था, अगले दिन राजा ने सेठ के ऊपर महल के भीतर आने पर जो प्रतिबन्ध लगाया था, उसे हटा दिया. राजा को संदेह से मुक्ति मिली और सेठजी को सबक, कि राजकर्मचारियों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए. 




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