मित्रलाभ - हितोपदेश की कहानी | Mitralabha - A Hitopadesha Story

 एक बार चित्रग्रीव नामक एक कबूतरों का सरदार अपने दल के अन्य कबूतरों के साथ आकाश में उड़ता हुआ कहीं जा रहा था. नीचे दूर दूर तक जंगल पसरा हुआ था. अचानक जंगल में एक खुले स्थान पर दल के एक कबूतर को चावल के दाने पड़े हुए नजर आये. 

वह कबूतर ललचाकर तुरंत अपने साथियों से बोला - "देखो, देखो, जमीन पर कितने सारे चावल के दाने पड़े हुए हैं. आओ चलकर उन्हें चुगते हैं."

दल के सरदार चित्रग्रीव ने जब यह सुना तो तुरंत मना करते हुए बोला - "कोई नीचे नहीं उतरेगा ! मुझे इन चावलों के दानों में कुछ रहस्य नजर आ रहा है. आखिर इस बियाबान जंगल में ये चावल के दाने आये कहाँ से ?"

सरदार की यह बात सुनकर एक दूसरा कबूतर चिढ़कर बोला - "आपका बुढ़ापा आ गया है इसलिए आपको हर चीज़ संदेहास्पद लगती है. अरे अब हम लोग अगर खाने पीने की चीज़ों को भी सन्देह की दृष्टि से देखेंगे तो फिर जियेंगे कैसे ?"

इतना कहकर वह कबूतर अन्य कबूतरों से बोला - "आओ साथियो, नीचे कितना सारा भोजन पड़ा है चलकर ग्रहण करते हैं. अगर हम सरदार की बात सुनेंगे तो भूखे मर जायेंगे. मैं तो चावल के दाने चुगने के लिए नीचे उतर रहा हूँ."

उस कबूतर की बात का कई अन्य कबूतरों ने भी समर्थन किया और कई सारे कबूतर नीचे उतरने लगे. यह देखकर चित्रग्रीव अपने अन्य साथियों से बोला - "मित्रो, हमारे कई साथी चावल के दानों के लोभ में आकर नीचे उतर रहे हैं. मैं इसे उचित नहीं समझता हूँ किन्तु हमें उनके साथ रहना चाहिए क्योंकि आखिर वे सब भी अपने ही हैं और अपनों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए."

इतना कहकर चित्रग्रीव और शेष सारे कबूतर भी जहां चावल के दाने बिखरे हुए थे, वहाँ उतर गए और चुगने लगे. किन्तु यह क्या ? चित्रग्रीव ने जो आशंका व्यक्त की थी वह सत्य साबित हो गई ! वहाँ चावल के दानों के बीच में महीन धागों का बना हुआ जाल पड़ा था जिसमें सारे कबूतर फंस गए. यह जाल एक बहेलिये ने बिछाया था जो दूर एक झाडी में छुपकर बैठा हुआ सब देख रहा था. 

जाल में फंसते ही सारे कबूतर उस कबूतर को कोसने लगे जिसने नीचे उतरने की सलाह दी थी. तब चित्रग्रीव बोला - "मित्रो, यह सत्य है कि हमारे एक साथी की नादानी की वजह से हम सब मुसीबत में फंस चुके हैं. किन्तु यह समय उसे कोसने और भला बुरा कहने का नहीं है बल्कि इस मुसीबत से पार पाने के लिए एक रहने का है. यदि हम एक रहेंगे तो इस समस्या से भी जीत ही जायेंगे क्योंकि संगठन में शक्ति होती है. अब तुम सब जैसा मैं कहता हूँ, वैसा करो." 

सारे कबूतर अपने सरदार की बात ध्यानपूर्वक सुनने लगे. सरदार बोला - "इससे पहले कि बहेलिया आकर हमें पकड़ ले, हमें इस जाल समेत आकाश में उड़ जाना है."

एक दूसरा कबूतर बोला - "उससे क्या होगा सरदार ? हमें उड़ता देख बहेलिया हमारे पीछे पीछे आएगा और हमें आसानी से पकड़ लेगा क्योंकि हम कहीं न कहीं तो उतरेंगे ही !"

चित्रग्रीव बोला - "ऐसा नहीं होगा. हम यहाँ से गण्डकी नदी के किनारे एक स्थान पर चलेंगे. वहाँ मेरा मित्र हिरण्यक नामक चूहा रहता है. वह बहेलिये के हम तक पहुँचने के पहले हमारा जाल काटकर हमें आजाद कर देगा. इसलिए समय व्यर्थ न गंवाकर तुरंत उड़ चलो क्योंकि बहेलिया अब हमारी तरफ ही आ रहा है."

दूर बैठा बहेलिया इतने सारे कबूतरों को अपने जाल में फंसा देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था. जैसे ही वह अपने शिकारों को पकड़ने के लिए उनकी ओर चला, उसने देखा कि अचानक सारे कबूतर उसका जाल लेकर आकाश में उड़ गए हैं. 

बहेलिया उन कबूतरों के पीछे पीछे भागने लगा. किन्तु कबूतर तीव्र गति से उड़ते हुए चित्रग्रीव द्वारा बताये स्थान पर पहुंच गए और वहाँ जाकर सावधानीपूर्वक जाल सहित नीचे उतर गए. वहीं नदी के किनारे एक बिल में हिरण्यक नाम का चूहा रहता था. 

चित्रग्रीव ने जब अपने मित्र हिरण्यक को आवाज लगाईं तो वह बाहर आया और  चित्रग्रीव को इस हाल में देखकर बड़ा दुखी हुआ. वह तुरंत उसके बंधन काटने के लिए आगे बढ़ा. किन्तु चित्रग्रीव बोला - "सबसे पहले मेरे नहीं बल्कि मेरे साथियों के बंधन काटो."

यह सुनकर हिरण्यक चूहा बोला - "मित्र, ये कबूतर तो बहुत सारे हैं. इन सबके बंधन काटते काटते यदि मेरे दांत टूट गए तो तुम आजाद नहीं हो पाओगे. इसलिए मैं पहले तुम्हारे ही बंधन काटूँगा क्योंकि तुम मेरे मित्र हो."

यह सुनकर चित्रग्रीव बोला - "नहीं मित्र, यह नायक का धर्म नहीं है. मैं इस दल का नायक हूँ, मेरा धर्म ये है कि पहले मैं अपने दल के सभी सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करूं तब अंत में अपनी. इसलिए तुम पहले मेरे साथियों के ही बंधन काटो और अंत में मेरे."

हिरण्यक अपने मित्र के ऊंचे विचारों से बहुत प्रभावित हुआ और उसने चित्रग्रीव की इच्छानुसार धीरे धीरे करके सारे कबूतरों के बंधन काट दिए. सबसे अंत में चित्रग्रीव को भी बंधनमुक्त कर दिया. 

बहेलिया जब तक वहाँ पहुंचा, सभी कबूतर आजाद हो चुके थे. उसके हाथ सिवाय अपने कटे पिटे जाल के और कुछ नहीं लगा.




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