बूढ़े की संदूकची - लोक कथा | Sandookchi - A Folk tale in Hindi

एक बूढ़ा किसान गाँव के अपने छोटे से घर में अकेला रहता था. उसकी पत्नी गुजर चुकी थी और जो उसके तीन बेटे थे, वे जैसे जैसे उनकी शादियाँ होती गईं, वैसे वैसे अपनी अपनी पत्नियों को लेकर नजदीकी शहर में रहने चले गए थे. 

बूढ़ा अब कमजोर हो चला था और उसे एक देखभाल करने वाले की सख्त जरूरत थी. उसके तीनों स्वार्थी बेटे मात्र औपचारिकता पूरी करने भर के लिए महीने में एकाध बार उससे कुछ देर के लिए मिलने आते थे और वापस चले जाते थे. बेटों की अपने बूढ़े पिता के प्रति उदासीनता का एक बड़ा कारण यह भी था कि बूढ़े के पास कोई ऐसी संपत्ति या आय का पुख्ता स्रोत नहीं था जिसके लालच में वे उससे प्रीति रखते. 

बूढ़ा अपने बेटों की लालची प्रवृत्ति को जानता था किन्तु उसकी समझ में यह नहीं आता था कि वह ऐसा क्या करे ताकि उसके बेटे उसके अंतिम दिनों में उसकी देखभाल करें. एक दिन सारी रात वह यही सोचता रहा और अंत में उसे एक उपाय सूझ गया. 

सुबह होते ही अपनी लाठी टेकता टेकता वह गाँव के कबाड़ी के पास गया और वहाँ से उसने एक पुरानी जंग खाई हुई लोहे की चादर खरीदी. कबाड़ी की दूकान से ही उसने एक बेहद पुराना ताला भी ख़रीदा और दोनों सामान लेकर अपने एक लोहार मित्र की दुकान पर पहुँच गया. लोहार से उसने उस चादर की एक संदूकची बनाने को कहा. 

जब संदूकची बन गई तो बूढ़े ने उसमें कांच के छोटे-छोटे टुकड़े भर दिए और ताला लगाकर अपने घर ले आया. वह संदूकची उसने अपने बिस्तर के नीचे कुछ इस तरह से रखी कि वह छुपी हुई सी भी लगे और थोड़ी थोड़ी दिखे भी. इसके बाद वह अपने बेटों के आने का इंतज़ार करने लगा. 

कुछ दिनों बाद, एक दोपहर उसके बेटे उससे मिलने आये. बूढ़े की आशा के अनुरूप, एक बेटे की नजर उस संदूकची पर पड़ ही गई. उसने तुरंत पूछा - "पिताजी, ये संदूकची कैसी है ? इसमें क्या है ?"

बूढ़ा मानो बात को टालने का सा अभिनय करता हुआ बोला- "अरे कुछ नहीं, ये तो बहुत पुरानी है. इसमें मेरा कुछ फालतू सामान है और कुछ नहीं."

बूढ़े की बात सुनकर बेटों ने अविश्वास भरी नज़रों से एक-दूसरे की ओर देखा. तभी बूढ़ा पानी पीने का बहाना करके कमरे से बाहर निकल गया. 

उसके निकलते ही बेटों ने फ़ौरन संदूकची को बाहर निकाल कर हिला-डुला कर देखा. हिलाते ही कांच के टुकड़ों के बजने की आवाज हुई. बेटों को लगा इसमें जरूर सोने-चांदी के सिक्के और जेवर आदि भरे हुए हैं. 

"पिताजी तो बड़े छुपे रुस्तम निकले !" एक बेटा बोला, "लाखों का माल घर में रखे हुए हैं और हमें खबर तक नहीं !"

"जो भी हो, अगर उन्होंने इसे बचा कर रखा हुआ है, तो हमारे लिए ही तो रखा है. देखते नहीं कैसा ताला लगा हुआ है जैसे बरसों से नहीं खुला है." दूसरा बेटा बोला. 

"तुम सही कहते हो. मुझे लगता है उन्होंने अब तक इसे कहीं गाड़कर रखा था और अब इसलिए निकाल लिया है ताकि उनके मरने के बाद हमें ये आसानी से मिल जाए. आखिर हम तीनों ही तो उनके वारिस हैं." तीसरे बेटे ने कहा. 

मंझला बेटा बोला - "वो सब तो ठीक है लेकिन अब हम क्या करें ? पिताजी अभी तो इसे हमें देने वाले हैं नहीं, क्योंकि अगर उन्हें देना होता तो वे 'इसमें फ़ालतू सामान है' ऐसा नहीं कहते! और अगर हम इसे ऐसे ही पिताजी के पास छोड़कर चले जाते हैं तो कोई भी गांववाला इसे आसानी से चुरा सकता है ?"

"बिलकुल ठीक कहते हो तुम," बड़ा बेटा बोला, "अब इस संदूकची की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी है क्योंकि इसमें जो धन है वो पिताजी के बाद हमारा ही तो है. और पिताजी अब हैं ही कितने दिनों के मेहमान ? कुछ ही महीनों में चल बसेंगे."

इतने में बूढ़े के बाहर से आने की आहट हुई तो बेटों ने संदूकची वापस बिस्तर के नीचे सरका दी और बाहर आकर विचार - विमर्श करने लगे कि पिताजी के मरने तक इस धन की सुरक्षा कैसे की जाय ?

आखिर तय हुआ कि बारी बारी से प्रत्येक बेटा एक एक महीने पिताजी के पास रहेगा और संदूकची की सुरक्षा करेगा. सबसे पहले छोटा बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के लेकर एक महीने पिताजी के पास रहा. फिर मंझले और अंत में बड़े बेटे का नंबर आया. इसी तरह से तीनों बेटों के आने जाने का यह क्रम चलने लगा. 

बहुओं को भी पता चल गया था कि पिताजी की संदूकची में लाखों का सोना - चांदी है सो वे पिताजी की खूब सेवा सुश्रूषा करतीं, उनकी हर आज्ञा का पालन करतीं. पोते-पोतियों के साथ बूढ़े का बुढापा मजे में कटने लगा. 

इसके बाद बूढ़ा करीब दो साल और जिया. इस दौरान न उसके बेटे-बहुओं ने उसे एक दिन के लिए भी अकेला  छोड़ा और न उसने ही संदूकची को अकेला छोड़ा. 

आखिर जब बूढ़ा मर गया और उसका अंतिम संस्कार हो चुका, तब बेटों ने संदूकची का ताला तोड़कर उसे खोला. संदूकची खोलते ही उनकी आशाओं पर पानी फिर गया क्योंकि उसमें तो कांच के टुकड़े भरे थे. नीचे एक कागज़ का पुर्जा रखा हुआ था जिस पर लिखा था - 

"प्यारे बेटो, जैसा मैंने कहा था, इस संदूकची में फालतू सामान ही है. मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था, तुम जैसे नालायक और लालची बेटों से बुढ़ापे में अपनी देखभाल कराने का यही एक तरीका था."




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