सोने का पिंड - रूसी लोक कथा | Sone ka Pind - A Russian folk tale in Hindi

 बहुत पुरानी बात है, रूस में एक गाँव था जिसके ज़्यादातर निवासी गरीब किसान थे। गाँव में केवल एक ही आदमी अमीर था और वह था उस गाँव का जागीरदार। वह बड़ा लालची और कंजूस प्रवृत्ति का व्यक्ति था और कभी किसी के ऊपर एक पैसा खर्च न कर सकता था। कभी किसी को मुफ्त में पानी तक पिलाने में उसकी जान निकलती थी। 

एक रोज गाँव के कुछ किसान  मित्र आपस में बैठे गप्पें लड़ा रहे थे। लोग अपने-अपने बारे में लंबी-लंबी हांक रहे थे कि मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, मैंने यह किया, मैंने वह किया वगैरा वगैरा। तभी एक किसान बोल उठा - "पहले तुमने क्या किया वह जाने दो, आगे क्या कर के दिखा सकते हो वह बताओ ?"

इस पर एक किसान बोला - "मैं जागीरदार के घर खाना खाकर दिखा सकता हूँ !"

"असंभव ! एक बार आसमान से तारे तोड़ लाने को कहते तो मान भी लेते मगर हमारे परम कंजूस जागीरदार के घर भोजन करने की बात तो संभव ही नहीं हो सकती !" एक दूसरा किसान हँसते हुये बोला। 

"लगाते हो शर्त ? मैंने जो कहा वह करके दिखा सकता हूँ ! अगर मैंने जागीरदार के घर भोजन करके दिखा दिया तो तुम्हारा घोडा मेरा हो जाएगा और अगर न कर सका तो मैं तुम्हारे खेतों में एक साल तक मुफ्त मजदूरी करूंगा।"

"तुम्हारी शर्त मंजूर है .... ! तुम जरूर हारोगे !" दूसरे किसान ने हँसते हुये कहा। 

अगले दिन वह किसान अपने मित्रों के साथ जागीरदार की बैठक में पहुंचा और बैठ गया। इधर-उधर की बातें होने लगीं तभी वह किसान धीरे से उठा और जाकर जागीरदार के कान में  फुसफुसाया - "हुजूर, आपसे एक बात पूछनी थी !"

"क्या ?" जागीरदार ने पूछा। 

किसान ने अपना टोप उतारा और उसे जागीरदार के सामने करते हुये उसके कान में बोला- "हुजूर, मेरे इस टोप के बराबर सोने के पिंड की कीमत कितनी होगी ?"

'सोना' सुनते ही जागीरदार के कान खड़े हो गए। वह सोचने लगा इस किसान के पास इतना बड़ा सोने का पिंड कहाँ से आया ? जरूर इसे खेतों में काम करते हुये कहीं गड़ा हुआ मिल गया है, तभी पूछ रहा है। मुझे वह सोने का पिंड इससे हड़पना होगा। 

उसने किसान के कान के पास मुंह ले जाकर धीरे से कहा - "अभी थोड़ी देर में बताता हूँ ... तब तक चुपचाप बैठ जाओ।"

यह सुनकर किसान धीरे से बोला - "अच्छा तो हुजूर तब तक मैं अपने घर हो आता हूँ। भूख लग रही है, भोजन करके आऊँगा तब पूछ लूँगा।" इतना कहकर वह चलने को उद्यत हो गया। 

जागीरदार ने सोचा, अगर यह यहाँ से गया तो सोने के पिंड की बात किसी और को बता सकता है। एक बार बात सबको मालूम हो गई फिर वह सोने का पिंड हड़पना मुश्किल हो जाएगा। अभी तक तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इसने किसी को बताया नहीं है अन्यथा यह मेरे कान में इस तरह फुसफुसाता क्यों ?

 उसने तुरंत का किसान का हाथ पकड़कर कहा - "अरे, भूख लग रही है तो घर जाने की क्या जरूरत है ? क्या एक दिन मेरे घर खाना नहीं खा सकते ?" इतना कहकर उसने नौकर को बुलाया और कहा - "देखो इसे भीतर ले जाकर बढ़िया भोजन कराओ। मैं अभी थोड़ी देर में आता हूँ।"

नौकर किसान को भोजन कराने के लिए भीतर ले गया। उधर किसान के मित्र यह देखकर हतप्रभ थे कि इसने आखिर जागीरदार के कान में ऐसा क्या कह दिया जो वह इसे अपने घर ससम्मान भोजन करा रहा है ?

कुछ ही देर में जागीरदार ने किसान के मित्रों को चलता कर दिया और घर के भीतर वहाँ पहुंचा जहां किसान भोजन कर रहा था। उसे देखकर जागीरदार बोला - "खाओ, खाओ, जी भर के खाओ ... इसे अपना ही घर समझो।"

किसान ने छककर खाना खाया और अंत में डकार लेकर जागीरदार को प्रणाम करके चलने को हुआ। जागीरदार बोला - "अरे वह सोने के पिंड वाली बात तो कर लो !"

किसान चौंकने का अभिनय करता हुआ बोला - "अरे हाँ हुजूर, वह तो मैं भूल ही गया ? तो बताइये, मेरे इस टोप के बराबर के सोने के पिंड की कीमत कितनी होगी ?"

जागीरदार बोला - "पहले मुझे वह सोने का पिंड दिखाओ तो !"

किसान - "कौनसा सोने का पिंड ?"

जागीरदार - "वही, जिसकी कीमत तुम जानना चाहते हो ?"

किसान हँसते हुये बोला - "अरे हुजूर .... मेरे पास ऐसा कोई पिंड नहीं है ... मैं तो बस अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए जानना चाहता था !"

यह सुनते ही जागीरदार आगबबूला हो गया और गालियां बकता हुआ किसान को मारने दौड़ा। हँसता हुआ किसान वहाँ से फौरन नौ-दो-ग्यारह हो गया। 

इस तरह किसान ने अपनी चतुराई से न सिर्फ कंजूस जागीरदार के घर स्वादिष्ट पकवानों का आनंद उठाया बल्कि शर्त के मुताबिक अपने मित्र का घोडा भी जीत लिया। 




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