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5/18/2021

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भारत की ओर से इस खिलाड़ी ने खेली थी अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच में पहली गेंद

 क्या आप जानते हैं कि जब भारत ने अपना सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच खेला था तो भारत की ओर से सबसे पहली गेंद का सामना करने वाला खिलाड़ी कौन था ? आइये जानते हैं उस खिलाड़ी के बारे में …

भारत ने अपना सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच इंग्लैंड के खिलाफ इंग्लैंड की ही धरती पर लॉर्ड्स के मैदान पर 25 जून 1932 को खेला था. सी.के. नायडू इस मैच में भारतीय टीम के कप्तान थे तथा अन्य खिलाड़ी थे - लाल सिंह, फिरोज पालिया, जहाँगीर खान, मोहम्मद निसार, अमर सिंह, बहादुर कपाड़िया, शंकर राव गोदाम्बे, गुलाम मोहम्मद, जनार्दन नावले, सैयद वज़ीर आली, महाराजा ऑफ पोरबंदर, के एस लिंबड़ी, नज़ीर आली, जोगिंदर सिंह, नऊमल जऊमल, सोरबजी कोलन, नरीमन मार्शल  ।

लेकिन पहली गेंद खेलने का सौभाग्य जिस खिलाड़ी को प्राप्त हुआ उसका नाम था जनार्दन ज्ञानोबा नावले

Janardan Navle is seen standing last in the first row (Image : Wikipedia)

जनार्दन नावले इस मैच की पहली पारी में मात्र 12 रन बनाकर आउट हो गए थे लेकिन अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैचों में भारत की ओर से पहली गेंद खेलने वाले खिलाड़ी के रूप में इतिहास में दर्ज हो गए. यही नहीं, वे भारत की ओर से आउट होने वाले सबसे पहले बल्लेबाज भी बने.

जनार्दन नावले का जन्म एक साधारण किसान परिवार में 7 दिसम्बर 1902 को फुलगाँव में हुआ था. भारतीय टेस्ट टीम में उनका चयन एक विकेटकीपर बल्लेबाज के रूप में हुआ था. 31 वर्ष की उम्र हो जाने के कारण उनका टेस्ट कैरियर ज्यादा लम्बा नहीं चल पाया और वे मात्र 2 टेस्ट मैचों में ही भारतीय टीम का हिस्सा रह पाए.

(The information is about the Indian cricketer who faced first test ball for India in 1932, Janardan Gyanoba Navle)

5/17/2021

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इंसान तो इंसान, यहाँ तो गधे भी पायजामा पहनते हैं

 फ्रांस के पश्चिमी तट पर Rhea नाम का एक आइलैंड है. गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए पर्यटकों की यह पसंदीदा जगह है. इस आकर्षण के  पीछे जो कारण हैं उनमें आइलैंड की खूबसूरती, वहाँ का खुशगवार मौसम तो है ही, साथ ही एक अन्य आकर्षण भी है और वह है यहाँ के पायजामा पहनने वाले गधे. जी हाँ, गधे ! यानी कि donkey.

Poitou प्रजाति के ये गधे हैं तो गधे ही, पर सामान्य गधों से थोड़े बड़े डीलडौल वाले और ताकतवर होते हैं. एक तरह से ये दुर्लभ गधे भी हैं क्योंकि इनकी संख्या काफी कम रह गई है. कभी ये गधे इस द्वीप पर नमक फैक्ट्री में काम करते थे, हालांकि अब ऐसा नहीं होता.

लेकिन ये गधे पायजामा क्यों पहनते हैं ? इसके पीछे भी कहानी है. दरअसल नमक निकालने के दौरान इन गधों को कई बार दलदल में उतरना पड़ता था. वहाँ इन्हें अक्सर मच्छर और दूसरे कीड़े काट लिया करते थे. इस समस्या से निजात पाने के लिए इनके मालिकों ने इन्हें पायजामे पहनाने शुरू कर दिए.

अब जब नमक का काम बंद हो गया है तब भी इन गधों को पायजामा पहने देखा जा सकता है, क्योंकि अब वह पायजामा इनकी पहचान बन गया है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी. आखिर एक सभ्य और well dressed गधे के ऊपर सवारी करने का आनंद ही कुछ और है !

Images - (Wikimedia1, Wikimedia2)

5/09/2021

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‘टेडी बियर’ के अस्तित्व में आने की कहानी, इसके पीछे है एक रोचक किस्सा

 ‘टेडी बियर’ वह प्यारा खिलौना है जो बच्चों को तो बहुत पसंद होता ही है बड़ों को भी खूब भाता है. हर उस घर में जिसमें बच्चे होते हैं, छोटा या बड़ा एक टेडी बियर तो होता ही है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘टेडी बियर’ को टेडी बियर क्यों कहते हैं? इसका यह नाम कैसे पड़ा और यह खिलौना कब और कैसे अस्तित्व में आया ? इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है जिसका सम्बन्ध एक पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति से है.

अमरीका के 26वें राष्ट्रपति थे थियोडोर ‘टेडी’ रुजवेल्ट, जो एक बार सन 1902 में मिसिसिपी राज्य के गवर्नर के न्यौते पर जंगल में भालू का शिकार करने गए. राष्ट्रपति के अमले में लोगों के अलावा कई शिकारी कुत्ते और घोड़े शामिल थे.

जंगल में तम्बू लगा दिए गए और भालू की तलाश शुरू हुई.  पूरे दिन ढूंढ़ते रहे पर एक भी भालू कहीं नहीं दिखा. दूसरे दिन फिर तलाश शुरू हुई लेकिन फिर भी जंगल में एक भी भालू नजर नहीं आया. राष्ट्रपति रूजवेल्ट और उनके साथ के दूसरे आला अफसर मायूस हो चले थे.

राष्ट्रपति की टीम के कुछ सदस्यों को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने सोचा कि यदि राष्ट्रपति इस तरह बिना शिकार किये यहाँ से चले गए तो उनकी बहुत बदनामी होगी. यही सोचकर कुछ सदस्य फिर से जंगल में गए और कहीं से एक बूढ़े से भालू को पकड़ लाये और पेड़ से बाँध दिया.

राष्ट्रपति से कहा गया कि वे इस पर गोली चला कर अपना शिकार का शौक पूरा कर सकते हैं. परन्तु रूजवेल्ट को उस भालू पर दया आ गई और उन्होंने उस पर गोली चलाने से इनकार कर दिया. पेड़ से बंधे भालू को देखकर वे बोले, “मैं शिकार के लिए लगभग पूरे अमेरिका में घूमा हूं. मुझे गर्व है कि मैं एक शिकारी हूं, लेकिन एक बूढे हो चुके असहाय भालू को मारकर मुझे गर्व की अनुभूति नहीं होगी, वह भी तब जब यह पेड़ से बंधा हुआ हो”.

राष्ट्रपति की शिकार करने वाली टीम में कुछ पत्रकार भी शामिल थे सो अगले ही दिन यह घटना अमेरिका के अखबारों की हैडलाइन बन गई. जानेमाने अमेरिकी अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने तो इसके ऊपर एक कार्टून ही बनाकर छाप दिया.

Wikipedia

ये कार्टून मॉरिस मिकटॉम नाम के एक रूसी यहूदी ने देखा जो ब्रुकलिन में दिन में टॉफियां बेचते थे और रात में अपनी पत्नी के साथ मिल कर सॉफ्ट टॉय बनाते थे. मिकटॉम ने एक कपड़े से भालू का बच्चे का खिलौना बनाया और अपनी दुकान पर रखा और नीचे नाम लिखा ‘टेडी बीयर’.


मिकटॉम ने  ऐसा ही एक खिलौना बना कर राष्ट्रपति रूजवेल्ट को भी भेजा जो उन्हें बहुत पसंद आया और उन्होंने तुरंत इसके लिए अपना नाम इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी.

टेडी बियर कुछ ही समय में पूरे अमेरिका में लोकप्रिय हो गया और मिकटॉम टॉफियां बेचना बंद कर के पूरी तरह से टेडी बियर के धंधे में उतर गए. 1904  में रूजवेल्ट ने इसे रिपब्लिकन पार्टी के चिन्ह के रूप में भी अपनाने की इजाजत दे दी.

आज टेडी बियर पूरी दुनिया में फ़ैल चुका है और बच्चों की पहली पसंद बन गया है.

और पढ़ें ... 

5/08/2021

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दुनिया की सबसे छोटी फ्लाइट जो महज 2.7 किमी की दूरी तय करती है

हवाई यात्रा की बात हो तो इसका मतलब यही समझा जाता है कि यात्रा अवश्य ही लम्बी होगी. लेकिन दुनिया में एक हवाई रूट इतना छोटा है कि इससे ज्यादा लम्बा तो आप सुबह – सुबह वाक करके आते होंगे. जी हाँ, दुनिया में एक फ्लाइट है जो महज डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है.

इस वीडियो में जानिये कहाँ चलती है फ्लाइट –

5/01/2021

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वो भारतीय, जिसने बताया कि Peak XV दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है

 

8850 मीटर ऊँची दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट के बारे में तो आप सबने सुना-पढ़ा होगा पर क्या आपको इस चीज का अंदाजा है कि इस चोटी की ऊंचाई को सबसे पहले एक भारतीय ने मापा था ना कि ब्रिटिश सरकार के किसी अधिकारी ने. 

वह भारतीय था राधानाथ सिकदर जो इतने बड़े योगदान के बाद भी इतिहास के पन्नो में कही खो गया. जिस शख्स की शोहरत पूरी दुनिया में होनी चाहिए उसके बारे में आज शायद ही किसी को पता होगा. इस वीडियो में जानिये पूरी कहानी –


4/29/2021

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100 साल पहले एक औरत इसलिए प्रसिद्ध हुई थी कि उसे कोई हंसा नहीं सकता था

 दुनिया में हर रोज घोटाले उजागर होते हैं. कई घोटाले आपने सुने होंगे लेकिन आज हम आपको एक अजीबोगरीब घोटाले के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे आप ‘मुस्कान घोटाला’ या ‘हंसी घोटाला’ कह सकते हैं. ये घोटाला कोई 100 साल पहले हुआ था. पूरा किस्सा जानने के लिए इस पोस्ट को आखिर तक पढ़ते रहिये.

न्यूयॉर्क में एक थिएटर हुआ करता था जिसका नाम था Hammerstein’s जिसे 1904 से 1914 Willie Hammerstein नामक शख्स चलाया करता था. इस थिएटर में लोगों के मनोरंजन के लिए तरह तरह के छोटे- छोटे एक्ट हुआ करते थे जैसे कि आजकल स्टैंडअप कॉमेडी शोज में होते हैं.

Wikimedia Commons


1907 में इस थिएटर से एक नाम जुड़ा, Sober Sue. ये एक महिला थी जिसके बारे में कहा गया कि इस महिला को कोई हंसा नहीं सकता है. थिएटर के मालिकों ने इस महिला को हंसाने वाले के लिए 1000 डॉलर का इनाम रखा.

शुरू शुरू में दर्शकों में से कई लोगों ने इस महिला के सामने तरह तरह की हरकतें करके, चुटकुले सुनाकर हंसाने का प्रयास किया, लेकिन विफल रहे. बाद में इस महिला को हंसाने के लिए प्रोफेशनल कॉमेडियन भी आने लगे मगर Sober Sue को न हँसना था और न वो हंसी. यहाँ तक कि उसने कभी एक छोटी सी मुस्कान तक न बिखेरी.

बहरहाल, Sober Sue ‘कभी न हंसने वाली महिला’ के रूप में विख्यात हो गईं और उसकी प्रसिद्धि के चक्कर में थिएटर वालों का धंधा भी खूब चला. स्टेज पर अपनी उपस्थिति के लिए Sober Sue को 20 डॉलर प्रति सप्ताह दिए जाते थे जो उस जमाने के हिसाब से ठीक ही थे. Sober Sue को हंसाने के लिए कई बड़े बड़े कॉमेडियन्स ने चैलेंज स्वीकार किया और फ्री में उस थिएटर में अपनी परफॉरमेंस दी मगर उस महिला को हंसा न सके.

लेकिन जैसे कि हर ढोल की पोल आखिर खुलती ही है, थिएटर वालों की पोल भी एक दिन खुल ही गई. आखिर Sober Sue को हंसी क्यों नहीं आती, लोग जब इस बात के पीछे पड़े और जानकारी जुटाई तो जो राज पता चला उससे थिएटर वालों की जम कर थू थू हो गई.

पता चला कि Sober Sue तो हंसी आने के बावजूद भी चाहकर भी नहीं हंस सकतीं क्योंकि उनके चेहरे की वे मांसपेशियां, जिनसे हंसी या मुस्कान के भाव प्रदर्शित होते हैं, लकवाग्रस्त हैं. अर्थात वह महिला मन ही मन चाहे कितना ही हंस ले, चेहरे पर उसे दिखाने में समर्थ ही नहीं थी. इस बात का पता जब उन कॉमेडियन लोगों को चला जिन्होंने Sober Sue को हंसाने के चक्कर में फ्री में HammerStein के थिएटर में परफॉर्म किया, तो वे ठगे से रह गए और उन्होंने इसके लिए थिएटर मालिकों को कभी माफ़ नहीं किया.

(Featured Image Source : Note - Not the actual photograph of Sober Sue)

3/09/2021

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दुनिया की सबसे अजीबोगरीब वसीयत करने वाला आदमी

बात सन 1926 की है जब चार्ल्स मिलर नाम का एक अविवाहित और निसंतान वकील बड़ी अजीबोगरीब वसीयत छोडकर मर गया। उसने अपनी वसीयत में लिखा कि उसकी संपत्ति का एक बड़ा भाग शहर की उस महिला को दे दिया जाये तो उसकी मौत के अगले 10 साल में सबसे ज्यादा बच्चे पैदा करके दिखाये। 

इसके बाद बच्चे पैदा करने की जो होड़ शुरू हुई उसे कनाडा के इतिहास में The Great Stork Derby of Toronto के नाम से जाना जाता है। 

1854 में जन्मे Charles Vance Millar अपनी मौत होने तक कोई बहुत बड़ी नामचीन हस्ती नहीं थे, हालांकि मज़ाकिया स्वभाव  ने शादी नहीं की थी और नतीजतन उनके कोई अपने बच्चे भी नहीं थे। हाँ, आर्थिक रूप से काफी मजबूत थे और काफी संपत्ति छोडकर मरे थे । 

मौत से पहले चार्ल्स मिलर ने अपनी काफी मज़ाकिया वसीयत लिखी थी, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चित क्लॉज़ था, अगले 10 सालों में सबसे ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली महिला को अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा देना। संपत्ति का ये हिस्सा आज के हिसाब से लगभग 10 मिलियन डॉलर के बराबर था। 

अब इतनी बड़ी रकम किसी के भी मन में लालच पैदा कर देने के लिए काफी होती है। तो टोरंटो की महिलाओं में बच्चे पैदा करने की होड़ लग गई। करीब 11 परिवार आखिर तक होड़ में डटे रहे लेकिन अवधि पूरी होने पर उनमें से केवल चार ही युगल ऐसे सामने आए जिन्होने सर्वाधिक 9 - 9 बच्चे पैदा किए। 

न्यायालय द्वारा मिलर द्वारा निर्दिष्ट संपत्ति को चारों परिवारों में बराबर बाँट दिया गया। 

इसके अलावा भी मिलर ने अपनी वसीयत में कई मज़ाकिया बातें लिखी थीं। जैसे कि अपनी एक संपत्ति को वे ऐसे तीन वकीलों के आजीवन उपभोग के लिए छोड़ गए जो आपस में एक दूसरे से शत्रु की तरह नफरत करते थे। इस संपत्ति को, जो कि, जमैका में एक holiday estate थी, न तो ये वकील बेच सकते थे, और न ही उनमें से कोई अकेला उसका उपयोग कर सकता था। शर्त के अनुसार तीनों एक साथ ही इसका उपभोग कर सकते थे।  

3/05/2021

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27 अरब की दौलत का मालिक है ये कुत्ता ... कैसे आई इतनी दौलत ?

दुनिया का सबसे अमीर जानवर - Gunther IV (Richest animal in the World)

दुनिया में बहुत से पालतू जानवर हैं जो ऐशोआराम और ठाटबाट की ज़िंदगी जीते हैं लेकिन उनका वह ऐशोआराम अपनी खुद की दौलत के दम पर नहीं बल्कि उनके मालिकों की दौलत के दम पर होता है। कुछेक ही जानवर ऐसे हैं जिनके पास अपनी खुद की दौलत है, जिसके मालिक वे खुद हैं, और इनमें टॉप पर है ये जर्मन शेफर्ड, जिसका नाम है Gunther IV

क्या आप जानते हैं Gunther IV नाम का ये कुत्ता कितनी दौलत का मालिक है ? मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये कुत्ता लगभग 400 मिलियन डॉलर की संपत्ति का मालिक है और संभवतः दुनिया का सबसे अमीर जानवर है। सबसे बड़ी बात ये है कि Gunther IV के पास जो संपत्ति है वह उसे अपने पिता से मिली है यानी वो एक खानदानी रईस है। 

तो आखिर इस कुत्ते की रईसी का राज क्या है ? 

कुत्तों के इस रईस खानदान की कहानी सन 1991 में शुरू होती है जब कार्लोटा लिबेन्स्टीन नाम की एक जर्मन काउंटेस का निधन हो गया। काउंटेस काफी अमीर थीं और उस समय उनकी संपत्ति की कीमत लगभग 100 मिलियन डॉलर थी।  दिलचस्प बात ये थी कि दुनिया में उनका कोई भी ऐसा निकट संबंधी नहीं था जिसे वे अपनी संपत्ति दे जातीं। अगर कोई उनके सर्वाधिक निकट था तो वह था उनका कुत्ता Gunther II. इसलिए अपनी वसीयत में वे अपनी सारी संपत्ति अपने कुत्ते के नाम लिख गईं। 

कानूनी तौर पर जानवर सम्पत्तियों के मालिक नहीं हो सकते इसलिए ऐसी स्थिति में जानवरों के नाम पर छोड़ी  गई सम्पत्तियों का ट्रस्ट बना दिया जाता है। ट्रस्टी सदस्य ही संपत्ति की देखभाल करते हैं और उसे लाभार्थी जानवर के कल्याणार्थ कैसे खर्च करना है यह तय करते हैं। 

Gunther II  के बाद भी संपत्ति का दुरुपयोग न हो या उसे कोई हड़प न ले इसलिए काउंटेस कार्लोटा ने वसीयत में प्रावधान किया कि उनकी संपत्ति के लाभार्थी Gunther II और उसके बाद उसके वंशज  रहेंगे। और फिर यहीं से शुरू हो गई Gunther Dynasty ...

आज Gunther खानदान का वारिस Gunther IV है। ट्रस्ट के सदस्यों के सूझबूझ भरे निवेश के कारण उसकी संपत्ति बढ़कर 375 मिलियन डॉलर के आसपास पहुँच चुकी है। वह मियामी के एक आलीशान मैनशन में रहता है और अपनी लिमोजीन कार में चलता है।  उसकी सेवा में नौकरचाकरों की फौज लगी रहती है और वह दुनिया का बेहतरीन से बेहतरीन खाना खाता है। ज़्यादातर इन्सानों के लिए जो ऐशोंआराम एक सुखद स्वप्न हैं वो इस कुत्ते को सहज ही उपलब्ध हैं। 

हालांकि दुनिया में और भी कई पालतू जानवर हैं जिनके नाम उनके मालिकों ने संपत्ति छोड़ी है लेकिन जितनी Gunther Dynasty के पास है, उतनी किसी के पास नहीं। 

2/18/2021

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अघोरेश्वर बाबा कीनाराम और लोलार्क षष्ठी

 लोलार्क षष्ठी या ललई छठ एक हिन्दू त्यौहार है जो हर वर्ष हिन्दू कलेंडर के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की छठवीं तिथि को मनाई जाती है। इस पर्व के सूत्र सत्रहवीं सदी के एक प्रसिद्ध अघोरी संत बाबा कीनाराम से जुड़े माने जाते हैं, जो अपनी अलौकिक शक्तियों के लिए विख्यात थे।


बाबा कीनाराम का जन्म सन 1601 ई॰ में चंदौली (उत्तरप्रदेश) के रामगढ़ गाँव के अकबर सिंह और मनसादेवी के घर  हुआ था। कहा जाता है कि अपने जन्म के बाद आम शिशुओं की तरह बाबा तीन दिनों तक न तो रोये और न ही उन्होने अपनी माता का दूध पिया। तीन दिन बाद तीन साधु (लोक मान्यता है कि वे तीनों साधु ब्रह्मा, विष्णु, महेश थे) वहाँ आए और उन्होने बाबा को अपनी गोद में लिया और उनके कान में कुछ कहा। आश्चर्यजनक रूप से उन साधुओं से मिलने के बाद बाबा अपने जन्म के बाद पहली बार रोने लगे। तभी से जन्म के पाँच दिन बाद की तिथि लोलार्क षष्ठी या ललई छठ के रूप में मनाई जाने लगी।

बाबा बाल्यावस्था से ही विरक्त रहते थे और थोड़े बड़े होने पर उन्होने घर भी छोड़ दिया । वे उस समय के अनेक सुप्रसिद्ध साधकों जैसे संत शिवाराम, औघड़ कालूराम आदि के सानिध्य में भी रहे और अपना जीवन उन्होने साधना करने और अपनी सिद्धियों को लोक-कल्याणार्थ उपयोग करने में लगाया। उनके अलौकिक चमत्कारों की अनेक कहानियाँ प्रसिद्ध हैं जिन्हें आप विकिपीडिया पर यहाँ पढ़ सकते हैं ।

बाबा किनाराम ने 'विवेकसार', 'रामगीता', 'रामरसाल' और 'उन्मुनिराम' नाम की चार पुस्तकें लिखीं जिनमें से 'विवेकसार' अघोर पंथ के सिद्धांतों पर अत्यंत प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है।

सन 1769 में करीब 170 वर्ष की आयु में बाबा ने समाधि ले ली और ये नश्वर शरीर त्याग दिया। वाराणसी में आज भी बाबा किनाराम स्थल बना हुआ है जिसकी स्थापना बाबा द्वारा ही की गई थी। हर साल उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में बाबा का जन्मदिन उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। 2019 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कार्यक्रम में भाग लिया था और उन्होने कहा था कि बाबा किनाराम के जन्मस्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।

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बकरियों ने वीडियो कॉल करके कमाए 50 लाख रुपये ! किसान ने निकाला कमाल का बिजनेस आइडिया

 अङ्ग्रेज़ी में कहावत है An Idea can change your life ! कभी कभी कुछ कमाल के आइडिया ऐसे होते हैं जिन पर उन्हें करने वाले को भी विश्वास नहीं होता कि ये मैंने क्या कर डाला।


AFP की रिपोर्ट के अनुसार एक ब्रिटिश किसान Dot McCarthy को लॉकडाउन के दौरान ऐसा ही एक आइडिया आया जो शुरू तो मज़ाक मज़ाक में हुआ था लेकिन उससे उन्होने करीब 50 हजार पाउंड कमा डाले। भारतीय रुपयों में ये रकम लगभग 50 लाख रुपयों के बराबर होती है। आइडिया आप सुनेंगे तो हैरान रह जाएँगे।

कोरोना संकट के दौरान जब अधिकांश कंपनियों में 'वर्क फ्राम होम' हो रहा था और कर्मचारियों की मीटिंग्स वीडियो काल्स के माध्यम से हो रहीं थीं, तब इस किसान ने अपनी बकरियों को वीडियो मीटिंग्स के दौरान किराये पर देने का बिजनेस शुरू किया।


ये महिला किसान मोबाइल के माध्यम से अपनी बकरियों को Zoom Video meetings में जोड़ती थी और उसकी बकरी मीटिंग में मौजूद अन्य व्यक्तियों के साथ दिखाई देने लगती थी। अपनी मीटिंग में इस अनोखे मेम्बर को देखकर बाकी सदस्यों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती थी और यही वजह रही कि किसान का बिजनेस चल निकला।

उसने एक मीटिंग की फीस रखी 5 पाउंड, वो भी 5 मिनट की कॉल के लिए। कोरोना काल में लंबी लंबी बोरियत भरी वीडियो मीटिंग्स में हल्के फुल्के मज़ाक के रूप बकरियों को शामिल करने का ये आइडिया हिट हो गया और किसान ने 50 हजार पाउंड कमा डाले।

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भारतीय आम बजट के बारे में कुछ रोचक तथ्य

 

भारत का आम बजट (Union Budget 2021) आने में बस कुछ ही घंटे शेष बचे हैं। ये बजट हमारे लिए कितनी राहत, कितनी चिंता लेकर आने वाला है ये तो कल ही पता चलेगा लेकिन बजट के इतिहास से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं, जिन्हें आपको जरूर जानना चाहिए।

  • भारत का पहला बजट James Wilson ने 18 फरवरी 1869 को पेश किया था। James Wilson एक Scotish Businessman थे जो तत्कालीन Finance Member of India Council थे।
  • स्वतंत्र भारत का पहला बजट 26 नवम्बर 1947 को देश के पहले वित्तमंत्री आर के शनमुखम शेट्टी ने प्रस्तुत किया था।
  • 1955 तक बजट (Budget) केवल अङ्ग्रेज़ी में ही छापा जाता था लेकिन 1955-56 से बजट की प्रतियाँ अङ्ग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषाओं में छापी जाने लगीं।
  • भारत में सबसे ज्यादा केन्द्रीय बजट मोरारजी देसाई ने प्रस्तुत किए हैं जिन्हें कुल 10 बार बजट पेश करने का मौका मिला। उनके बाद पी चिदम्बरम का नाम आता है जिन्होने कुल 8 बार बजट पेश किया।
  • इन्दिरा गांधी बजट पेश करने वाली पहली महिला मंत्री थीं। उन्होने सन 1970-71 में कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री के साथ साथ वित्तमंत्री का दायित्व भी संभाला था।
  • 1973-74 का बजट, जिसे वाय बी चव्हाण ने पेश किया था, Black Budget माना जाता है क्योंकि उसमें 550 करोड़ का घाटा दिखाया गया था।
  • 2016 तक बजट फरवरी के अंतिम दिवस को पेश करने की परंपरा थी लेकिन 2017 से इसे बदल दिया गया। अब भारत का आम बजट 1 फरवरी को पेश किया जाता है।
  • 2017 से ही रेल बजट, जो पिछले 92 सालों से अलग से पेश किया जाता था, आम बजट में ही समाहित कर दिया गया।
  • 2019 में वित्तमंत्री निर्मला सीतारामन ने बजट ब्रीफकेस लाने की परंपरा भी तोड़ दी। वे उसकी जगह  राष्ट्रीय चिन्ह युक्त लाल पैकेट में 'बही खाता' लेकर आईं थीं।
  • 1 फरवरी 2020 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारामन ने इतिहास का सबसे लंबा बजट भाषण दिया था। उनका भाषण 2 घंटे 41 मिनट तक चला था।

(Facts about Indian Union Budget, Budget facts 2021, historical budget facts)

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जब खोज कोलंबस ने की थी तो फिर अमेरिका का नाम कोलंबसिया क्यों नहीं रखा गया ?

 ये तो आप जानते ही होंगे अमेरिका की खोज इटली के एक बहुत बड़े एक्सप्लोरर क्रिस्टोफर कोलंबस ने की थी, सन 1492 में ... 

दरअसल कोलंबस जब अपने घर इटली से निकले थे तब वो इंडिया की खोज में निकले थे॰ वैसे इंडिया की खोज के लिए निकले थे, ये कहना भी सही नहीं होगा, दरअसल वो यूरोप से भारत के लिए समुद्री मार्ग की खोज में निकले थे ताकि समुद्री रास्ते से भारत के साथ निर्द्वंद्व होकर व्यापार किया जा सके।


लेकिन जब वो समुद्र में निकले तो रास्ता भटक गए और एक नए महाद्वीप पर पहुँच गए।  कोलंबस को ये एहसास ही नहीं हुआ कि वो एक नई जगह पर पहुँच गया है। उसे लगा कि यही इंडिया है। उसने इंडिया को खोज लिया है। उसने उस जगह के मूल निवासियों को Indians कहना भी शुरू कर दिया। इसीलिए अमेरिका के मूल निवासियों कई सदियों तक इंडियंस के नाम से जाना जाता रहा। अगर आपने कभी अमेरीकन इंडियंस के बारे में सुना होगा तो आपके दिमाग में ये खयाल जरूर आया होगा कि अमेरिका में इंडियंस कहाँ से आए। इंडिया तो यहाँ हैं और इंडियन तो हम हैं, तो फिर अमेरिका के मूल निवासियों को इंडियन क्यों कहा जाता है। उसकी वजह कोलंबस की यही भूल थी। उसे लगा उसने इंडिया खोज निकाला है और उसने वहाँ के निवासियों को इंडियंस कहना शुरू कर दिया। लेकिन दरअसल वो इंडिया नहीं था ... वो था अमेरिका ।


खैर कोलंबस को बिलकुल समझ में नहीं आया कि वो इंडिया नहीं बल्कि एक नई जगह पहुँच गया है। वो तो बहुत खुश था कि उसने आखिरकार इंडिया खोज लिया है । लेकिन उसके कुछ साल बाद 1499 में इटली के ही एक दूसरे एक्सप्लोरर Amerigo Vespucci, कोलंबस वाले रास्ते पर गए और उस नई जगह पर पहुंचे तब उसको लगा कि ये इंडिया नहीं है, ये तो कोई नई जगह है। एक बार वो लौट आया, फिर दुबारा 1502 में गया, और कन्फ़र्म हो गया कि ये इंडिया तो नहीं है, और कोई जगह है। फिर उसने लौट कर अपना पूरा यात्रा वृत्तांत लिखा और उसमें बताया कि कोलंबस ने जो जगह खोजी है, वो इंडिया नहीं है। वो कोई नई जगह है और उसने उस जगह का नाम रख दिया New world।


यानि अमेरिका का सबसे पहला नाम पड़ा, New World। कोलंबस भी बेचारा ये जानकर हैरान रह गया, क्योंकि
वो तो सोचता था कि उसने एशिया के लिए नया रूट खोज लिया है, लेकिन अब उसकी भी समझ में आया कि उसने कोई नया महाद्वीप ही खोज निकाला है।

बहरहाल, 1507 में एक जर्मन मानचित्रकार Martin Waldseemuller ने विश्व का एक मानचित्र बनाया और उस मानचित्र में उस new world को भी शामिल किया॰ ऐसा माना जाता है कि मानचित्रकार कोलंबस के बजाए Amerigo Vespucci से बहुत प्रभावित था, एक तरह से उनका चेला था, इसलिए उसने new world का नाम अमेरिगो के नाम पर रखने का फैसला कर लिया। लेकिन अमेरिगो एक पुल्लिंग नाम था, और उस समय, जहां वो मानचित्रकार रहता था वहाँ देशों के नाम स्त्रीलिंग माने जाते थे, तो उसने Latin की डिक्शनरी में Amerigo का स्त्रीलिंग ढूंढा और वो मिला America।

बस तब से New World का नाम हो गया America। यानी भले ही कोलंबस ने अमेरिका की खोज की, लेकिन उसे
नाम मिला एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर, जो कोलंबस के कई साल बाद अमेरिका पहुंचा था।

(The above post is an answer to the questions like - Why is it called America ? Who the America is named after ? America is named after which explorer ?)

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आज़ादी से पहले के भारत में चलने वाले सिक्कों और नोटों की अनदेखी तस्वीरें

 करेंसी ... नोट ... पैसा ... रोज ही देखते हो .... लेकिन आज हम आपको भारत में किसी जमाने में चलने वाली जिस मुद्रा की तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं, वो आप में से 99 प्रतिशत लोगों ने शायद ही कभी देखी हो। और उसका कारण ये हैं कि हम में से अधिकांश के पैदा होने के बहुत बहुत पहले ही इनका प्रचलन बंद हो चुका था।

ये तस्वीरें है भारत के आजाद होने के पहले चलने वाले कुछ खास सिक्कों और रुपयों की ...

सबसे पहले शुरुआत करते हैं 1 पैसे के सिक्के से ... जी हाँ एक पैसा ! ये 1944 का सिक्का है ... कभी देखा था क्या ?


और अब देखिये 2 आना का सिक्का ... दो आना का मतलब कितने पैसे होता है, कौन कौन जानता है  (हम नहीं बताने वाले हैं, हाँ )


लो भाई ये है .... 4 आना पुराने जमाने का .... वैसे चवन्नी तो आजादी के बाद भी कई सालों तक चलती रही है

 


और ये है ... उस जमाने का आधा रुपैया यानि आठ आना का सिक्का -


और सबसे खास सिक्का तो ये है .... 1 बटे 12 आना ... कितने पैसे हुये कोई बताओ भाई !


लेकिन अब जो तस्वीरें आप देखेंगे वो बेहद खास हैं .... क्योंकि उस जमाने में कुछ रजवाड़े ऐसे भी थे जो लेनदेन के लिए अपनी खुद की मुद्रा भी चलाते थे .... जैसे कि ये देख लो ...


और ये है उस जमाने का हैदराबादी नोट....  एक रुपये का ....


और अब जरा ये बताइये कि आपने अढ़ाई रुपये का नोट देखा है कभी ? नहीं देखा होगा, इसलिए आज देख लो ... ये भी चलता था कभी हमारे देश में ....


तो कैसे लगीं आपको ये तस्वीरें ? क्या आपने पहले कभी इन्हें या इनमें से किसी को देखा था ? कमेंट में जरूर बताइएगा।

(Historical pics of Indian currency,notes, bills and coins, Princely states currencies. Images Courtesy : Wikimedia Commons)

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मात्र 87 घंटों में महिला ने की सातों महाद्वीपों की यात्रा, गिनीज़ बुक में दर्ज हुआ नाम

 विश्व रिकॉर्ड बनाना हंसी खेल नहीं होता लेकिन कुछ लोग इतने जुनूनी होते हैं कि कोई अड़चन उन्हें अपना लक्ष्य पूरा करने से रोक नहीं पाती। अब अगर आप पूरी दुनिया के भ्रमण की योजना बनाएँ तो शायद महीनों का प्रोग्राम बनाएँगे लेकिन संयुक्त अरब अमीरात की एक महिला ने ये कारनामा मात्र 3 दिन 14 घंटे 46 मिनट और 48 सेकंड में कर दिखाया।



ये महिला हैं डॉ॰ खावला अल रोमाइथी । उन्होने इसी साल फरवरी में 87 घंटों के भीतर ही दुनिया के 208 देशों की यात्रा कर डाली और अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज करा लिया। उनकी ये यात्रा 13 फरवरी 2020 को सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में समाप्त हुई।

 
जरा सोचिए, कितनी भागमभाग वाली रही होगी ये यात्रा !! (Source : Timesnownews)
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बेंगलुरु के वैज्ञानिक ने बना ली कोरोना को मारने वाली डिवाइस

 दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। अब तक न तो इसका कोई इलाज सामने आ पाया है और न ही इससे बचने का कोई कारगर तरीका ।

लेकिन ऐसे में बेंगलुरु के वैज्ञानिक डॉ राजा विजयकुमार ने एक ऐसी डिवाइस बनाने में सफलता प्राप्त कर ली है जो कोरोना के प्रसार को रोकने में रामबाण तरीका कहा जा सकता है। खुशी की बात ये है उनकी डिवाइस के सभी टेस्ट पूरे हो चुके हैं और manufacturing phase में जाने की स्थिति में पहुँच चुकी है।


Shycocan नाम की एक छोटे ड्रम के आकार की ये डिवाइस न सिर्फ सार्वजनिक स्थलों जैसे ऑफिस, माल, सिनेमाघर आदि में लगाई जा सकती है बल्कि घर में भी लगाई जा सकती है। ये एक डिवाइस अपने आसपास के 10 हजार घनमीटर के क्षेत्र में मौजूद 99.9 प्रतिशत कोरोना वाइरस को न्यूट्रलाइज करने में सक्षम है।

अब आपके दिमाग में ये सवाल जरूर आ रहा होगा ये डिवाइस काम कैसे करती है, इसके पीछे क्या साइन्स है। तो आइये संक्षेप में आपको बताते हैं।

दरअसल कोरोना वाइरस की संरचना एक खास तरह के प्रोटीन से बनी होती है । इस प्रोटीन में पॉज़िटिव पोटेन्शियल होता है और स्वाभाविक तौर पर ये नेगेटिव पोटैन्श्यल की तलाश में रहता है। जैसे ही ये किसी इंसान के शरीर के संपर्क में आता है तो वहाँ इसे नेगेटिव पोटैन्श्यल वाली सेल्स मिल जाती हैं और ये उनसे चिपक जाता है। वहाँ ये अपना डीएनए रिलीज करता है और अपनी संख्या बढ़ाने लगता है। इसी को हम कहते हैं कि कोरोना का संक्रमण हो
गया है। यानि कोरोना वाइरस में मौजूद प्रोटीन का जो पॉज़िटिव पोटैन्श्यल है, संक्रामण में उसकी भूमिका सबसे अहम है।

Shycocan डिवाइस कोरोना के प्रोटीन में मौजूद उस पॉज़िटिव पोटैन्श्यल को खत्म करने का ही काम करती है। ये डिवाइस अपने आसपास के वातावरण में एलेक्ट्रोन्स रेलीज़ करती है जिनमें नेगेटिव पोटैन्श्यल होता है। अब ऐसे में यदि उस स्थान पर कोरोना वाइरस मौजूद है तो ये एलेक्ट्रोन्स उसके पॉज़िटिव पोटैन्श्यल से मिलकर उसे neutralise कर देते हैं। एक बार neutralise होने के बाद कोरोना वाइरस सेल्स से चिपकने की अपनी क्षमता खो देता है और संक्रमण फैलाने योग्य नहीं रह जाता। फिर अगर ये किसी इंसान के शरीर के भीतर चला भी जाये तो कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता।

न्यूज़18 मीडिया की खबर के अनुसार इस डिवाइस का प्रोटोटाइप विगत मार्च में ही बना लिया गया था और तब से अमेरिका में इसकी टेस्टिंग चल रही थी। अच्छी खबर ये है कि करीब 26 तरह के परीक्षणों से गुजरने के बाद ये डिवाइस सभी पर खरी उतरी है और इसे अमेरिका की संस्था FDA की मंजूरी मिल गई है।

ये सही है कि ये डिवाइस किसी कोरोना से ग्रसित व्यक्ति का इलाज नहीं कर सकती लेकिन उससे किसी और को ना हो, इसकी रोकथाम बखूबी कर सकती है। एक बार ये डिवाइस बाजार में आ गई तो फिर सार्वजनिक जगहों जैसे Malls, hospitals, ऑफिसेज आदि जगहों पर संक्रमण होने का खतरा ना के बराबर रह जाएगा।

सबसे विशेष बात ये कि ये डिवाइस ज्यादा मंहगी भी नहीं होगी और आम आदमी भी इसे आसानी से अफफोर्ड कर पाएगा। न्यूज18 की खबर के अनुसार घरेलू उपयोग की डिवाइस की कीमत 600 रुपये के आसपास रहने की उम्मीद है जो कोरोना के खतरे को देखते हुये ज्यादा बड़ी रकम नहीं है।

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वो शिव मंदिर, जिसे एक ब्रिटिश कर्नल ने बनवाया था

भारत में अपने सैकड़ों साल के राज के दौरान अंग्रेजों ने अनेकों चर्च बनवाए लेकिन एक शिव मंदिर भी ऐसा है जिसका पुनर्निर्माण एक ब्रिटिश अधिकारी द्वारा कराया गया। बताया जाता है कि ये इकलौता ऐसा मंदिर है जिसे किसी अंग्रेज़ ने बनवाया ।
Credit - Patrika


ये मंदिर है मध्यप्रदेश के आगर मालवा में स्थित बैजनाथ महादेव मंदिर। इसका पुनर्निर्माण 1880 के दशक में लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन द्वारा कराया गया था। उनके इस काम के पीछे उनके जीवन की एक घटना जुड़ी हुई है जिसने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

कर्नल मार्टिन उन दिनों अफगान युद्ध में मोर्चे पर तैनात थे। उनकी एक आदत थी कि वे अपनी पत्नी को, जो कि उन दिनों आगर मालवा में रहती थीं, को नियमित रूप से पत्र भेजकर अपनी कुशलता का समाचार दिया करते थे। एक बार काफी लंबा समय हो गया और कर्नल का कोई पत्र नहीं आया। उस समय आज की तरह संचार साधन नहीं थे, पत्र ही एक मात्र जरिया था जिसके जरिये दूर मोर्चों पर तैनात सैनिकों की खोजख़बर घरवालों तक पहुँचती थी।

जब लंबा समय हो गया और कर्नल मार्टिन का कोई पत्र श्रीमति मार्टिन तक नहीं पहुंचा तब किसी अनिष्ट की आशंका से उनका मन घबराने लगा। अपने मन को शांत करने के लिए वे अक्सर घुड़सवारी के लिए निकल जाया करती थीं। एक दिन ऐसे ही घुड़सवारी करते हुये जब वे बैजनाथ महादेव मंदिर के पास से गुजरीं तो उन्होने देखा कि मंदिर में आरती हो रही थी।

आरती होते देख श्रीमती मार्टिन के मन में न जाने क्या विचार आया कि वे घोड़े से उतर कर मंदिर की ओर चली गईं। वहाँ पुजारियों ने जब उनका दुखी चेहरा देखा तो उनसे दुख का कारण पूछा। श्रीमती मार्टिन ने उन्हें पूरी बताई कि कैसे उनके पति युद्ध के मोर्चे पर गए हुये हैं और एक लंबे समय से उनका पत्र नहीं आया जबकि वे उन्हें लिखना कभी नहीं भूलते हैं।

उनकी कहानी सुनकर पुजारियों ने उन्हें 11 दिन तक शिवजी के मंत्र के जाप की सलाह दी। उस अंग्रेज़ महिला ने पुजारियों की सलाह मानकर वैसा ही किया और 10वें दिन तो चमत्कार हो गया। अफ़ग़ानिस्तान से उनके पति का पत्र आया जिसमें लिखा था - "मैं तुम्हें युद्धक्षेत्र से नियमित रूप से पत्र भेजता था लेकिन अचानक एक दिन पठानों ने हमारे चारों तरफ घेरा डाल दिया । जिसके कारण मुझे ऐसा लगा कि अब बचने का कोई रास्ता नहीं है। तब एक भारतीय योगी जिसके लंबे बाल थे और जिसने बाघ की खाल पहनी हुई थी, हाथों में त्रिशूल लेकर आ गया। उसके डर के मारे सारे अफगान भाग गए और जहां हम मौत के मुंह में जाने वाले थे, वहाँ हमें जीत हासिल हुई। इसके बाद उस योगी ने मुझसे कहा कि मुझे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, मेरी पत्नी मेरे लिए प्रार्थना कर रही है और इसीलिए वह मुझे बचाने यहाँ आया है।"

पत्र पढ़कर श्रीमती मार्टिन की आँखों में आँसू आ गए और वे मंदिर में जाकर भगवान शिव के चरणों में लोट गईं। कुछ हफ्ते बाद कर्नल मार्टिन भी आ गए और  श्रीमती मार्टिन ने उन्हें अपनी पूरी कहानी सुनाई। भगवान शिव का चमत्कार देख दोनों पति-पत्नी उनके भक्त हो गए।

1883 में कर्नल मार्टिन ने मंदिर के पुनरुद्धार के लिए 15000 रुपये दान किए। मार्टिन पति-पत्नी जब इंग्लैंड वापस गए तो ये निश्चय करके गए कि वे वहाँ भी अपने घर में शिव मंदिर बनवाएंगे और उन्होने ऐसा किया भी।

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Video : जब बाघ के सामने अचानक आ गया विशाल अजगर, देखिये वीडियो

 शेर और बाघ दो ऐसे प्राणी हैं जिन्हें देखकर वैसे तो बड़े बड़े जानवर रास्ता बदल देते हैं लेकिन कभी कभी जंगल में कोई ऐसा भी मिल जाता है जिसे देखकर इन खतरनाक जानवरों को भी दायें बाएँ होकर निकलना पड़ता है।


सोशल मीडिया पर इन दिनों ऐसा ही एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक बाघ के सामने अचानक एक विशाल अजगर आ जाता है। अजगर को देखकर बाघ की क्या प्रतिक्रिया होती है ये आप खुद वीडियो में देखिये। इस वीडियो को एक फॉरेस्ट अफसर ने twitter पर शेयर किया है -


जैसा कि आपने देखा, अजगर से पंगा लेने में बाघ भी डर रहा है, और दायें बाएँ होकर निकल जाता है।



 

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लड़कियों से बात कर सके इसलिए चुपके से टायर कर देता था पंक्चर

 कोई मनचला लड़कियों से बात करने के लिए कैसे कैसे अजीब तरीके अपना सकता है इसका एक ताज़ा उदाहरण जापान से सामने आया है।

Aichi Prefecture, Japan में एक 32 वर्षीय आदमी को लड़कियों की गाड़ियों के टायरों में cut लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है। ये आदमी सुपरमार्केट जैसी जगहों पर आने वाली महिलाओं की गाड़ियों के टायर में चुपके से cut लगा देता था, और बाद में खुद ही मदद करने पहुँच जाता था।


अब तक करीब 1000 महिलाओं की गाड़ियों के टायर पंक्चर कर चुका ये आदमी शायद अभी पकड़ा भी न जाता अगर उसने एक ही महिला की गाड़ी दूसरी बार न पंक्चर की होती।

दरअसल हाल ही में एक सुपरमार्केट में ख़रीदारी करने आई एक महिला जब अपनी गाड़ी लेकर अपने घर की ओर चली तो थोड़ी दूर चलते ही उसे एहसास हुआ कि गाड़ी का एक टायर पंक्चर हो गया है। अभी वह उतरकर टायर को देख ही रही थी कि तभी पीछे से एक आदमी आया और बड़े ही दोस्ताना ढंग से उसे टायर बदलने में मदद की पेशकश करने लगा।

उस आदमी को देखते ही महिला को याद आया कि करीब एक साल पहले भी उसकी गाड़ी इसी तरह इसी जगह पर पंक्चर हुई थी और तब भी एक आदमी इसी तरह मदद करने आया था। महिला ने जब उस आदमी को गौर से देखा तो उसे लगा कि यह कहीं वही आदमी तो नहीं है।



फिर क्या था, महिला ने किसी अनहोनी की आशंका के चलते पुलिस बुला ली। पुलिस ने जब सुपर मार्केट के बाहर लगे कैमरों को चेक किया तो पता चला कि इसी आदमी ने कुछ ही मिनट पहले महिला की गाड़ी में कट लगाया था और फिर एक तरफ खड़े होकर इंतज़ार कर रहा था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक पूछताछ करने पर आदमी ने बताया कि ऐसा उसने इसलिए किया ताकि वह महिला से बात कर सके। इतना ही नहीं पुलिस ने यह भी पता लगाया  कि वह सालों से ऐसा कर रहा है और अब तक वह करीब एक हजार महिलाओं के साथ ऐसा कर चुका है।

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जब दो पायलटों की शर्त के चक्कर में मारे गए थे 70 लोग

 दुनिया में ऐसे बहुत कम केस होते हैं जब मात्र पायलट की गलती ही प्लेन क्रैश के लिए जिम्मेदार होती है। ऐसा ही एक केस हुआ 1986 में सोवियत रूस में, जब 70 निर्दोष लोग पायलटों की मूर्खतापूर्ण शर्त की बलि चढ़ गए थे।


20 अक्तूबर 1986 को एक हवाई जहाज 87 यात्रियों और 7 क्रू मेम्बर्स को लेकर Yekaterinburg से Kuybyshev के लिए आ रहा था। पूरी यात्रा बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो चुकी थी, बस लैंडिंग होनी बाकी थी।

लैंडिंग के ठीक पहले जहाज के पायलट Alexander Kliuyev ने अपने को-पायलट से डींग हांक दी कि वह लैंडिंग कराने में इतना एक्सपर्ट है कि वह आँख बंद करके भी यानी बिना जमीन की ओर देखे भी, प्लेन को लैंड करा सकता है। को-पायलट को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। बस फिर क्या था ...लग गई शर्त !

कॉकपिट की सभी खिड्कियों पर पर्दे डाल दिये गए और पायलट जहाज को लैंड कराने लगा। नीचे स्थित एयर ट्रेफिक कंट्रोल ने जब जहाज को खतरनाक स्थिति में जमीन की ओर आते देखा तो उसने रेडियो पर पायलट को आगाह किया लेकिन पायलट कहाँ सुनने वाला था। उसने तो शर्त लगाई हुई थी।

फिर वही हुआ जिसकी आशंका थी। जहाज लगभग 280 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से जमीन से टकराया और क्रैश हो गया। इस दुर्घटना में जहाज में सवार कुल 94 लोगों में से 63 घटनास्थल पर ही मारे गए जबकि 7 की हॉस्पिटल में इलाज के दौरान मौत हो गई।

आश्चर्यजनक रूप से, शर्त लगाने वाला पायलट Alexander Kliuyev इस दुर्घटना में ज़िंदा बच गया जबकि को-पायलट हस्पताल जाते समय रास्ते में मर गया। विकिपीडिया पर दी गई जानकारी के अनुसार इस भीषण दुर्घटना के जिम्मेदार पायलट Alexander Kliuyev को मात्र 15 साल की सजा हुई और उसे भी बाद में घटाकर 6 साल कर दिया गया।

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जब इस देश की सेना और पक्षियों में हुआ युद्ध और सेना को हार माननी पड़ी

 ये रोचक घटना है सन 1932 की।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लौटे सेवानिवृत्त सैनिकों को ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा पुनर्वास के लिए ज़मीनें दी गईं। ये ज़मीनें ज़्यादातर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में थीं। सैनिकों ने बड़ी मेहनत से अपनी ज़मीनों को खेती के लिए तैयार किया और उन पर फसल लगानी शुरू की।


लेकिन उन सैनिक कृषकों के दुर्भाग्य से उनकी फसलों पर एक बड़े आकार वाले जंगली पक्षी एमू (Emu) का हमला हो गया। और ये एमू भी थोड़ी बहुत संख्या में नहीं, बल्कि करीब 20 हजार की संख्या में थे।

ये एमू हमला करके लौट जाते या आगे बढ़ जाते तो शायद और बात होती, लेकिन उन एमूओं ने जब देखा कि यहाँ तो खाने और पीने की बहुत बढ़िया सुविधा है तो उन्होने वहीं अपना डेरा डाल लिया। उन्होने न सिर्फ फसलें तबाह कर दीं बल्कि किसानों ने खेतों की रक्षा के लिए जो फेंसिंग आदि लगाईं थीं उन्हें भी तोड़ फोड़ दिया।


समस्या इतनी ज्यादा विकट हो गई कि किसानों का एक प्रतिनिधि मण्डल अपनी फरियाद लेकर ऑस्ट्रेलिया के रक्षामंत्री के पास भेजा गया। समस्या की गंभीरता को समझते हुये रक्षामंत्री ने सेना की एक टुकड़ी जो मशीन गनों से लैस थी, किसानों की सहायता के लिए भेजी।

2 नवम्बर 1932 को ऑपरेशन शुरू हुआ। करीब 50 एमूओं का एक झुंड सैनिकों को दिखा। लेकिन इससे पहले कि सैनिक उन्हें निशाना बना पाते, न जाने कैसे एमू समझ गए कि उन पर हमला होने वाला है। वे तुरंत तितर बितर हो गए और तेजी से मशीनगन की रेंज से दूर हो गए।

4 तारीख को फिर एक छोटे से बांध के किनारे सेना ने करीब 1000 एमूओं का झुंड देखा । लेकिन फायर शुरू करने के कुछ ही मिनट में मशीन गन जाम हो गई। उस दिन हालांकि 12 एमू मारे गए लेकिन इसके बाद एमू सतर्क हो गए।

किसानों और सैनिकों ने देखा कि उन्होने अपने आपको छोटे छोटे समूहों में बाँट लिया है और हर समूह का एक नेता बन गया है। उन्होने देखा कि जब तक समूह के सारे एमू खेतों को नष्ट करने के काम में लगे रहते हैं तब तक उनका नेता एमू अपनी गर्दन ऊंची किए चारों तरफ निगाह रखता है कि कोई हमला करने तो नहीं आ रहा। जैसे ही उसे कोई इंसान नजर आता है वह अपने समूह को आगाह कर देता है और वे सब भाग जाते हैं।

करीब 6 दिन के ऑपरेशन में 2500 राउंड फायर किए गए लेकिन सेना 20 हजार में से बमुश्किल 50 एमूओं को मारने में सफल हो पाई।

उधर एमूओं के खिलाफ सेना के इस ऑपरेशन की चर्चा मीडिया में शुरू हो गई और सरकार की आलोचना होने लगी। नतीजतन 8 नवम्बर को सरकार ने सेना को वापस बुला लिया।

सेना के जाते ही जैसे एमूओं ने अपनी जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया। अब किसानों के खेतों पर उनके हमले और भी तेज हो गए। किसानों ने दोबारा सरकार से गुहार लगाई तो एक बार फिर 13 नवम्बर को ऑपरेशन शुरू किया गया।

सेना फिर एक बार करीब एक पखवाड़े तक एमूओं को मारने की कोशिश करती रही । चूहे बिल्ली जैसे इस खेल में लेकिन इस चालाक पक्षी ने अद्भुत बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुये सेना को एक बार फिर से हार मानने पर मजबूर कर दिया।

एमूओं ने जिस तरह से सेना को छकाया उसे देखकर ऑपरेशन के इंचार्ज Major Meredith ने कहा  था कि यदि उनके पास इन पक्षियों की एक डिविजन होती और ये गोली चला सकते तो ये दुनिया की किसी भी मिलिटरी का सामना कर सकते थे ।

इस घटना को The Great Emu War के नाम से जाना जाता है।