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5/01/2021

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वो भारतीय, जिसने बताया कि Peak XV दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है

 

8850 मीटर ऊँची दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट के बारे में तो आप सबने सुना-पढ़ा होगा पर क्या आपको इस चीज का अंदाजा है कि इस चोटी की ऊंचाई को सबसे पहले एक भारतीय ने मापा था ना कि ब्रिटिश सरकार के किसी अधिकारी ने. 

वह भारतीय था राधानाथ सिकदर जो इतने बड़े योगदान के बाद भी इतिहास के पन्नो में कही खो गया. जिस शख्स की शोहरत पूरी दुनिया में होनी चाहिए उसके बारे में आज शायद ही किसी को पता होगा. इस वीडियो में जानिये पूरी कहानी –


3/24/2021

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भारत की ग्रेजुएट होने वाली सबसे पहली महिला का नाम जानते हो ?

महिलाओं के लिए शिक्षा सुलभ कराने के प्रयासों का अपना एक संघर्षपूर्ण इतिहास है। आज के युग में महिलाएं हर क्षेत्र में न सिर्फ पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं बल्कि कई बार उनसे आगे भी नजर आती हैं। ये सब सिर्फ और सिर्फ संभव हो पाया है तो महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोलने से । 

Who was the First Female Graduate of India ?

क्या आप जानते हैं भारत की ग्रेजुएट (स्नातक) होने वाली सबसे पहली महिला कौन थीं ? शायद आप न जानते हों लेकिन ये सामान्य ज्ञान के साथ साथ नारी-गौरव के इतिहास का एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हमें पता होना चाहिए। 

भारत की सबसे पहली ग्रेजुएट होने वाली महिलाएं थीं कादंबिनी गांगुली और चन्द्रमुखी बसु। इन दोनों ने 1883 में कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की थी। 

कादंबिनी गांगुली (Kadambini Ganguly)


कादंबिनी गांगुली का जन्म 1861 में बिहार के भागलपुर में हुआ था। उनके पिता भागलपुर के स्कूल में हैडमास्टर थे। 1883 में भारत की पहली महिला ग्रेजुएट बनने के बाद कादंबिनी ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया और वे इसके बाद भारत ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की पहली महिला फिजीशियन प्रैक्टिशनर भी बनीं। 

उच्च शिक्षा प्राप्त करने में रुचि दिखाने के कारण तत्कालीन संकीर्ण सोच वाले समाज ने उनकी काफी आलोचना भी की लेकिन इससे उनका हौसला जरा भी नहीं डिगा बल्कि वे महिलाओं के अधिकारों के लिए और भी अधिक मुखर होकर उभरीं। 

चन्द्रमुखी बसु (Chandramukhi Basu)


कादंबिनी गांगुली के साथ ही ग्रेजुएट होने वाली दूसरी महिला थीं चन्द्रमुखी बसु। 1860 में जन्मीं चन्द्रमुखी बसु देहरादून की रहने वाली थीं। उन्होने कादंबिनी से पहले ही सन 1876 में कोलकाता विश्वविद्यालय (University of Calcutta) की प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया था। बाद में 1878 में उन्हें कादंबिनी गांगुली के साथ Bethune College में प्रवेश दिया गया। 

ग्रेजुएशन के बाद चन्द्रमुखी ने MA पाठ्यक्रम में दाखिला ले लिया और इस तरह वे 1884 में भारत ही नहीं बल्कि पूरे ब्रिटिश साम्राज्य (British Empire) की पहली MA पास करने वाली महिला बनीं। 

Bonus : 

क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली महिला डॉक्टर (चिकित्सक) आनंदी गोपाल जोशी थीं जिन्होने अमेरिका जाकर मेडिकल की डिग्री हासिल की थी। 

3/09/2021

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दुनिया की सबसे अजीबोगरीब वसीयत करने वाला आदमी

बात सन 1926 की है जब चार्ल्स मिलर नाम का एक अविवाहित और निसंतान वकील बड़ी अजीबोगरीब वसीयत छोडकर मर गया। उसने अपनी वसीयत में लिखा कि उसकी संपत्ति का एक बड़ा भाग शहर की उस महिला को दे दिया जाये तो उसकी मौत के अगले 10 साल में सबसे ज्यादा बच्चे पैदा करके दिखाये। 

इसके बाद बच्चे पैदा करने की जो होड़ शुरू हुई उसे कनाडा के इतिहास में The Great Stork Derby of Toronto के नाम से जाना जाता है। 

1854 में जन्मे Charles Vance Millar अपनी मौत होने तक कोई बहुत बड़ी नामचीन हस्ती नहीं थे, हालांकि मज़ाकिया स्वभाव  ने शादी नहीं की थी और नतीजतन उनके कोई अपने बच्चे भी नहीं थे। हाँ, आर्थिक रूप से काफी मजबूत थे और काफी संपत्ति छोडकर मरे थे । 

मौत से पहले चार्ल्स मिलर ने अपनी काफी मज़ाकिया वसीयत लिखी थी, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चित क्लॉज़ था, अगले 10 सालों में सबसे ज्यादा बच्चे पैदा करने वाली महिला को अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा देना। संपत्ति का ये हिस्सा आज के हिसाब से लगभग 10 मिलियन डॉलर के बराबर था। 

अब इतनी बड़ी रकम किसी के भी मन में लालच पैदा कर देने के लिए काफी होती है। तो टोरंटो की महिलाओं में बच्चे पैदा करने की होड़ लग गई। करीब 11 परिवार आखिर तक होड़ में डटे रहे लेकिन अवधि पूरी होने पर उनमें से केवल चार ही युगल ऐसे सामने आए जिन्होने सर्वाधिक 9 - 9 बच्चे पैदा किए। 

न्यायालय द्वारा मिलर द्वारा निर्दिष्ट संपत्ति को चारों परिवारों में बराबर बाँट दिया गया। 

इसके अलावा भी मिलर ने अपनी वसीयत में कई मज़ाकिया बातें लिखी थीं। जैसे कि अपनी एक संपत्ति को वे ऐसे तीन वकीलों के आजीवन उपभोग के लिए छोड़ गए जो आपस में एक दूसरे से शत्रु की तरह नफरत करते थे। इस संपत्ति को, जो कि, जमैका में एक holiday estate थी, न तो ये वकील बेच सकते थे, और न ही उनमें से कोई अकेला उसका उपयोग कर सकता था। शर्त के अनुसार तीनों एक साथ ही इसका उपभोग कर सकते थे।  

2/18/2021

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अघोरेश्वर बाबा कीनाराम और लोलार्क षष्ठी

 लोलार्क षष्ठी या ललई छठ एक हिन्दू त्यौहार है जो हर वर्ष हिन्दू कलेंडर के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की छठवीं तिथि को मनाई जाती है। इस पर्व के सूत्र सत्रहवीं सदी के एक प्रसिद्ध अघोरी संत बाबा कीनाराम से जुड़े माने जाते हैं, जो अपनी अलौकिक शक्तियों के लिए विख्यात थे।


बाबा कीनाराम का जन्म सन 1601 ई॰ में चंदौली (उत्तरप्रदेश) के रामगढ़ गाँव के अकबर सिंह और मनसादेवी के घर  हुआ था। कहा जाता है कि अपने जन्म के बाद आम शिशुओं की तरह बाबा तीन दिनों तक न तो रोये और न ही उन्होने अपनी माता का दूध पिया। तीन दिन बाद तीन साधु (लोक मान्यता है कि वे तीनों साधु ब्रह्मा, विष्णु, महेश थे) वहाँ आए और उन्होने बाबा को अपनी गोद में लिया और उनके कान में कुछ कहा। आश्चर्यजनक रूप से उन साधुओं से मिलने के बाद बाबा अपने जन्म के बाद पहली बार रोने लगे। तभी से जन्म के पाँच दिन बाद की तिथि लोलार्क षष्ठी या ललई छठ के रूप में मनाई जाने लगी।

बाबा बाल्यावस्था से ही विरक्त रहते थे और थोड़े बड़े होने पर उन्होने घर भी छोड़ दिया । वे उस समय के अनेक सुप्रसिद्ध साधकों जैसे संत शिवाराम, औघड़ कालूराम आदि के सानिध्य में भी रहे और अपना जीवन उन्होने साधना करने और अपनी सिद्धियों को लोक-कल्याणार्थ उपयोग करने में लगाया। उनके अलौकिक चमत्कारों की अनेक कहानियाँ प्रसिद्ध हैं जिन्हें आप विकिपीडिया पर यहाँ पढ़ सकते हैं ।

बाबा किनाराम ने 'विवेकसार', 'रामगीता', 'रामरसाल' और 'उन्मुनिराम' नाम की चार पुस्तकें लिखीं जिनमें से 'विवेकसार' अघोर पंथ के सिद्धांतों पर अत्यंत प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है।

सन 1769 में करीब 170 वर्ष की आयु में बाबा ने समाधि ले ली और ये नश्वर शरीर त्याग दिया। वाराणसी में आज भी बाबा किनाराम स्थल बना हुआ है जिसकी स्थापना बाबा द्वारा ही की गई थी। हर साल उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में बाबा का जन्मदिन उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। 2019 में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कार्यक्रम में भाग लिया था और उन्होने कहा था कि बाबा किनाराम के जन्मस्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।

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आज़ादी से पहले के भारत में चलने वाले सिक्कों और नोटों की अनदेखी तस्वीरें

 करेंसी ... नोट ... पैसा ... रोज ही देखते हो .... लेकिन आज हम आपको भारत में किसी जमाने में चलने वाली जिस मुद्रा की तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं, वो आप में से 99 प्रतिशत लोगों ने शायद ही कभी देखी हो। और उसका कारण ये हैं कि हम में से अधिकांश के पैदा होने के बहुत बहुत पहले ही इनका प्रचलन बंद हो चुका था।

ये तस्वीरें है भारत के आजाद होने के पहले चलने वाले कुछ खास सिक्कों और रुपयों की ...

सबसे पहले शुरुआत करते हैं 1 पैसे के सिक्के से ... जी हाँ एक पैसा ! ये 1944 का सिक्का है ... कभी देखा था क्या ?


और अब देखिये 2 आना का सिक्का ... दो आना का मतलब कितने पैसे होता है, कौन कौन जानता है  (हम नहीं बताने वाले हैं, हाँ )


लो भाई ये है .... 4 आना पुराने जमाने का .... वैसे चवन्नी तो आजादी के बाद भी कई सालों तक चलती रही है

 


और ये है ... उस जमाने का आधा रुपैया यानि आठ आना का सिक्का -


और सबसे खास सिक्का तो ये है .... 1 बटे 12 आना ... कितने पैसे हुये कोई बताओ भाई !


लेकिन अब जो तस्वीरें आप देखेंगे वो बेहद खास हैं .... क्योंकि उस जमाने में कुछ रजवाड़े ऐसे भी थे जो लेनदेन के लिए अपनी खुद की मुद्रा भी चलाते थे .... जैसे कि ये देख लो ...


और ये है उस जमाने का हैदराबादी नोट....  एक रुपये का ....


और अब जरा ये बताइये कि आपने अढ़ाई रुपये का नोट देखा है कभी ? नहीं देखा होगा, इसलिए आज देख लो ... ये भी चलता था कभी हमारे देश में ....


तो कैसे लगीं आपको ये तस्वीरें ? क्या आपने पहले कभी इन्हें या इनमें से किसी को देखा था ? कमेंट में जरूर बताइएगा।

(Historical pics of Indian currency,notes, bills and coins, Princely states currencies. Images Courtesy : Wikimedia Commons)

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जब दो पायलटों की शर्त के चक्कर में मारे गए थे 70 लोग

 दुनिया में ऐसे बहुत कम केस होते हैं जब मात्र पायलट की गलती ही प्लेन क्रैश के लिए जिम्मेदार होती है। ऐसा ही एक केस हुआ 1986 में सोवियत रूस में, जब 70 निर्दोष लोग पायलटों की मूर्खतापूर्ण शर्त की बलि चढ़ गए थे।


20 अक्तूबर 1986 को एक हवाई जहाज 87 यात्रियों और 7 क्रू मेम्बर्स को लेकर Yekaterinburg से Kuybyshev के लिए आ रहा था। पूरी यात्रा बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो चुकी थी, बस लैंडिंग होनी बाकी थी।

लैंडिंग के ठीक पहले जहाज के पायलट Alexander Kliuyev ने अपने को-पायलट से डींग हांक दी कि वह लैंडिंग कराने में इतना एक्सपर्ट है कि वह आँख बंद करके भी यानी बिना जमीन की ओर देखे भी, प्लेन को लैंड करा सकता है। को-पायलट को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। बस फिर क्या था ...लग गई शर्त !

कॉकपिट की सभी खिड्कियों पर पर्दे डाल दिये गए और पायलट जहाज को लैंड कराने लगा। नीचे स्थित एयर ट्रेफिक कंट्रोल ने जब जहाज को खतरनाक स्थिति में जमीन की ओर आते देखा तो उसने रेडियो पर पायलट को आगाह किया लेकिन पायलट कहाँ सुनने वाला था। उसने तो शर्त लगाई हुई थी।

फिर वही हुआ जिसकी आशंका थी। जहाज लगभग 280 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से जमीन से टकराया और क्रैश हो गया। इस दुर्घटना में जहाज में सवार कुल 94 लोगों में से 63 घटनास्थल पर ही मारे गए जबकि 7 की हॉस्पिटल में इलाज के दौरान मौत हो गई।

आश्चर्यजनक रूप से, शर्त लगाने वाला पायलट Alexander Kliuyev इस दुर्घटना में ज़िंदा बच गया जबकि को-पायलट हस्पताल जाते समय रास्ते में मर गया। विकिपीडिया पर दी गई जानकारी के अनुसार इस भीषण दुर्घटना के जिम्मेदार पायलट Alexander Kliuyev को मात्र 15 साल की सजा हुई और उसे भी बाद में घटाकर 6 साल कर दिया गया।