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4/26/2021

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'दिल' के ऊपर शायरी | Dil Shayari in Hindi

 Dil Shayari



पढ़िये 'दिल' के ऊपर बेहतरीन शायरी जिसे दुनिया के बेहतरीन शायरों द्वारा लिखा गया है - 

दिल की बोली 

दिल की बातों को दिल समझता है 
दिल की बोली अजीब  बोली है 
(इब्न-ए-मुफ़्ती)

दिल है दिल 

ये दिल है दिल इसे सीने में हरगिज़
कभी रखना न तुम पत्थर बना के
(फराज़ सुल्तानपुरी)

दिल की लगी 

दिल की लगी दिल वाला जाने
क्या समझे समझाने वाला
(जका सिद्दीकी)

मुश्किल तो ये है 

मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है
मगर मुश्किल तो ये है दिल बदिल मुश्किल से मिलता है
(जलील मानिकपुरी)

दिल की आरज़ू 

होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू
जाता कहाँ है शमा को परवाना छोड़ कर
(जलील मानिकपुरी)

दिल लगा लेते हैं 

दिल लगा लेते हैं अहल-ए-दिल वतन कोई भी हो
फूल को खिलने से मतलब है चमन कोई भी हो
(बसीर सुल्तान काजमी )

तुम्हारा दिल

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
(दाग़ देहलवी)

इश्क़ में

इश्क़ में दिल का ये मंज़र देखा
आग में जैसे समुंदर देखा
(हनीफ़ अख़गर)

जो बेचते थे दवा-ए-दिल

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल
वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए
(बहादुर शाह ज़फ़र)

हज़ार आज़माइशें

दिल एक और हज़ार आज़माइशें ग़म की
दिया जला तो था लेकिन हवा की ज़द पर था
(मुशफ़िक़ ख़्वाजा)

उस का हँस देना

दिल का दुख जाना तो दिल का मसअला है पर हमें
उस का हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा
(अहमद फ़राज़)

धड़कने लगा दिल

धड़कने लगा दिल नज़र झुक गई
कभी उन से जब सामना हो गया
(जिगर मुरादाबादी)

दिल तुम्हारा हो गया

हमने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया
(जिगर मुरादाबादी)

दर्द का दिल

आज तो दिल के दर्द पर हंस कर
दर्द का दिल दुखा दिया मैंने
(ज़ुबैर अली ताबिश)

दिल ही न हो

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे
और जो दिल ही न हो तो क्या कीजे
(मंज़र लखनवी)

दिल दे तो इस मिजाज का

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुज़ार दे
(दाग़ देहलवी)

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4/10/2021

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जौन एलिया की शायरी | Jaun Elia Shayari in Hindi

 जौन एलिया की शायरी (Jaun Elia Shayari in Hindi)

जौन एलिया (Jaun Eliya) का नाम बीसवीं सदी के प्रमुख शायरों में गिना जाता है। उनका जन्म 1931 में अमरोहा (उत्तरप्रदेश) में हुआ था और मृत्यु सन 2002 में कराची (पाकिस्तान) में हुई। उनका पूरा नाम सैयद जौन असगर था लेकिन वे जौन एलिया (Jaun Eliya) के नाम से प्रसिद्ध थे। 

प्रस्तुत हैं जौन एलिया के कुछ प्रसिद्ध शेर - 

जो गुज़ारी न जा सकी हमसे 
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है 

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस 
खुद को तबाह कर लिया और मलाल  भी नहीं 

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या 

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में 

बहुत नजदीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या 

कौन इस घर की देखभाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है 

इलाज ये है कि मज़बूर कर दिया जाऊँ
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने 

उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं 

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं 

और तो क्या था बेचने के लिए
अपनी आँखों के ख्वाब बेचे हैं 

मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या 

ज़िंदगी एक फन है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का 

दिल की तकलीफ कम नहीं करते
अब कोई शिकवा हम नहीं करते 

अब नहीं कोई बात ख़तरे की
अब सभी को सभी से खतरा है 

अपना रिश्ता ज़मीं से ही रक्खो
कुछ नहीं आसमान में रक्खा 

काम की बात मैंने की ही नहीं
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं 

इक अजब हाल कि अब उसको
याद करना भी बेवफाई है 

शब जो हमसे हुआ मुआफ़ करो
नहीं पी थी बहक गए होंगे 

मैं जो हूँ 'जौन एलिया' हूँ जनाब
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा 

अपने सर इक बला तो लेनी थी
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है 

जानिए उससे निभेगी किस तरह
वो खुदा है मैं तो बंदा भी नहीं 

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3/30/2021

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शराब शायरी | शराब के ऊपर शायरी का संग्रह

Sharab Sher - Shayari Collection in Hindi 

समाज में शराब को भले ही अच्छी चीजों में न गिना जाता हो लेकिन शेरोशायरी की दुनिया में शराब को अहम स्थान प्राप्त है। जिन विषयों पर सर्वाधिक शेर लिखे गए हैं, शराब उन्हीं में से एक है। आप भी अगर बैठे बैठे इस साहित्यिक खुमारी का आनंद लेना चाहते हैं तो पढ़िये ये चुनिन्दा शराब शायरी का संग्रह, जिसमें हम आपके लिए लाये हैं उस्ताद शायरों द्वारा शराब के ऊपर लिखे गए बेहतरीन शेर - 

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई 
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई 

( निदा फ़ाजली) 

आए थे हँसते - खेलते मैखाने में 'फिराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए 

(फिराक़ गोरखपुरी)

बे-पिए ही शराब से नफ़रत 
ये ज़हालत नहीं तो फिर क्या है 

( साहिर लुधियानवी)

शब जो हमसे हुआ मुआफ़ करो 
नहीं पी थी बहक गए होंगे 

( जौन एलिया )

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मैखाने में 
जितनी हम  छोड़ दिया करते थे पैमाने में 

(दिवाकर राही )

शब को मय खूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली 
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई
 
(ज़लील मानिकपुरी )

ज़ाहिद शराब पीने से क़ाफ़िर हुआ मैं क्यूँ 
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया 

( ज़ौक़ )

लुत्फ-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद 
हाय कमबख़्त तूने पी ही नहीं 

( दाग़ देहलवी)

ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई 

(ज़ौक़)

'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में 

(ग़ालिब)

किधर से बर्क़ चमकती है देखें ऐ वाइज़
मैं अपना जाम उठाता हूँ तू किताब उठा 

( ज़िगर मुरादाबादी )

यारो मुझे मुआ'फ़ रखो मैं नशे में हूँ
अब दो तो जाम ख़ाली ही दो मैं नशे में हूँ

( मीर )

फ़ुर्सत ग़मों से पाना अगर है तो आओ 'नूर'
सब को करें सलाम चलो मय-कदे चलें

(कृष्ण बिहारी नूर)

उसके पियाले में ज़हर है कि शराब
कैसे मालूम हो बगैर पिये 

(फातिमा हसन)

पूछिए मयकशों से लुत्फ-ए-शराब
ये मज़ा पाक-बाज़ क्या जानें 

(दाग़ देहलवी)

गो हम शराब पीते हमेशा हैं दे के नक्द
लेकिन मज़ा कुछ और ही पाया उधार में 

(सरदार गेंदा सिंह मशरिकी)

गरचे अहले शराब हैं हम लोग
ये न समझो खराब हैं हम लोग 

(जिगर मुरादाबादी)

शिकन न दाल जबीं पर शराब देते हुये
ये मुसकुराती हुई चीज़ मुस्कुरा के पिला

(अब्दुल हमीद अदम)

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3/16/2021

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माफ़ी के ऊपर शायरी | Maafi Shayari in Hindi

Maafi Shayari, Mafi Shayari, Sorry Shayari, Poetry of apology in Hindi.

ज़िंदगी में जब हमसे कोई अपना रूठ जाये तो उसे मनाने के लिए तरह तरह के जतन करने पड़ते हैं। माफी मांगना, Sorry बोलना आदि करना पड़ता है। कभी कभी हम भी किसी से नाराज़ हो जाते हैं और हालात ऐसे होते हैं कि हमें उसे माफ करना पड़ता है। 

माफी मांगने, sorry बोलने या माफ करने आदि के लिए हिन्दू उर्दू में बहुत सारी कवितायें, शायरियाँ मौजूद हैं। किसी को माफ करते वक़्त या माफी मांगते वक़्त यदि इनका इस्तेमाल किया जाये तो उसका असर और भी जादुई होता है।

इस आर्टिकल में हम आपके लिए लाये हैं कुछ बेहतरीन और चुनिन्दा 'माफी शायरी' जिन्हें बड़े उस्ताद शायरों द्वारा लिखा गया है। तो देर किस बात की, चुन लीजिये जो आपको पसंद आए - 

खता माफ खताएँ तो हमसे होंगी ज़रूर 
कि ये तो फितरत-ए-आदम है क्या किया जाये 
(पुरनम इलाहाबादी)

हर एक जुर्म की पाता रहा सज़ा लेकिन 
हर एक जुर्म जमाने का मैंने माफ किया
(जीशान साहिल)

दे गया खूब सज़ा मुझ को कोई कर के मुआफ़
सर झुका ऐसे कि ता-उम्र उठाया न गया 
( सदा अंबालवी)

शब जो हम से हुआ मुआफ़ करो 
नहीं पी थी बहक गए होंगे 
(जौन एलिया)

तुम हो मुजरिम हम हैं मुल्ज़िम चलो नया इंसाफ करें 
तुम भी हमें मुआफी दे दो हम भी तुम्हें मुआफ़ करें 
(सरदार पंछी)

मुआफ़ी और इतनी सी खता पर 
सज़ा से काम चल जाता हमारा 
( शारिक़ कैफी )

मोहब्बतों की वफ़ा केश बारिशों से न रूठ 
किसी  से रूठ मगर अपने दोस्तों से न रूठ 
(  इरफ़ान सिद्दीकी )

ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले 
मैं अभी तक तेरी तस्वीर लिए बैठा हूँ 
(  क़ैसर उल जाफरी )

हाँ ये खता हुई थी कि हम उठ के चल दिये 
तुमने भी तो पलट के पुकारा नहीं हमें 
( नासिर जैदी )

तुम को चाहा तो खता क्या है बता दो मुझको 
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझको 
(दाग़ देहलवी)

कुछ नहीं इख़्तियार में फिर भी
हर ख़ता मेरी हर क़ुसूर मिरा
(मिर्ज़ा एहसान बेग)

वाइज़ ख़ता-मुआफ़ कि रिंदान-ए-मय-कदा
दिल के सिवा किसी का कहा मानते नहीं
(करम हैदराबादी)

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3/12/2021

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दाग़ देहलवी की शायरी | Dagh Dehalvi Shayari in Hindi

Dagh Dehalvi : Urdu Poet

उर्दू शायरी में दाग़ देहलवी (1831-1905) एक जानमाना नाम है। दाग़ देहलवी का पूरा नाम नवाब मिर्ज़ा खान दाग़ देहलवी था। उनकी शिक्षादीक्षा मुग़ल खानदान के संरक्षण में हुई और उन्हें मोहम्मद इब्राहीम 'ज़ौक़' जैसे बड़े शायर से तालीम हासिल करने का मौका मिला। 

दाग़ देहलवी अपनी रोमांटिक और भावप्रवण शायरी के लिए जाने जाते हैं। उनकी शायरी में उर्दू भाषा का प्राधान्य मिलता है जबकि उन्होने फारसी शब्दों का कम से कम प्रयोग किया है। प्रस्तुत हैं उनके कुछ चुनिन्दा शेरों का संकलन - 

Famous Sher-O-Shayari of Daagh Dehlvi in Hindi

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था 
न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था 

वादा करते नहीं ये कहते हैं 
तुझको उम्मीद-वार कौन करे 

खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं 
साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं 

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा 
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा 

तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता 
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता 

हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं 

आशिकी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता

लुत्फ-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कमबख्त तूने पी ही नहीं 

कहने देती नहीं कुछ मुँह से मुहब्बत मेरी 
लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत तेरी 

ये तो कहिए इस खता की क्या सजा 
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं 

जिसमें लाखों बरस की हूरें हों 
ऐसी जन्नत का क्या करे कोई 

हाथ रखकर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल 
हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं 
हज़रत-ए-दाग़ जहां बैठ गए बैठ गए 
और होंगे तेरी महफिल से उभरने वाले 

रुख़-ए-रौशन के आगे शम'अ रखकर वो ये कहते हैं 
उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है 

जमाने के क्या क्या सितम देखते हैं 
हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं 

इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है 
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं 

आईना देख के ये देख सँवरने वाले 
तुझ पे बेजा तो नहीं मरते ये मरने वाले 

जीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ हो 
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं 

हुआ है चार सज्दो पर ये दावा जाहिदों तुमको 
ख़ुदा ने क्या तुम्हारे हाथ जन्नत बेच डाली है 

राह पर उनको लगा लाये तो हैं बातों में 
और खुल जाएँगे दो-चार मुलाकातों में 

3/05/2021

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मोहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ की शायरी | Shayari of Zauq in Hindi

 19वीं सदी के बड़े शायरो में से एक नाम है शेख मुहम्मद इब्राहीम 'ज़ौक़' (Sheikh Mohammad Ibrahim 'Zauq') का। सन 1790 से लेकर 1854 तक जिये 'ज़ौक़' ने मात्र 19 साल की उम्र में ही मुग़ल दरबार में शायर के रूप में अपना स्थान बना लिया था। वे ग़ालिब के समकालीन थे और ऐसा कहा जाता है कि शायरी को लेकर दोनों में आपस में प्रतिद्वंद्विता भी चलती रहती थी। 

बेशक आज ग़ालिब का नाम शायरी की दुनिया में सबसे ऊपर माना जाता है लेकिन कहते हैं कि अपने जीवनकाल में ज़ौक़ ग़ालिब से ज्यादा लोकप्रिय शायर थे। 

खैर, प्रस्तुत हैं 'ज़ौक़' के कुछ प्रसिद्ध शेर, जो अपने आप में उनके एक श्रेष्ठ शायर होने की गवाही देते हैं - 

Famous Sher-O-Shayari of Sheikh Ibrahim 'Zauq' 

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यों 
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया  

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे 
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे 

ऐ 'ज़ौक़' तकल्लुफ में है तकलीफ़ सरासर 
आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता 

ऐ 'ज़ौक़' देख दुख्तर-ए-रज को न मुँह लगा 
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई 

मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे 
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे 

लाई हयात, आए, क़ज़ा ले चली, चले 
अपनी खुशी न आए, न अपनी खुशी चले 

हम रोने पे आ जाएँ तो दरिया ही बहा दें 
शबनम की तरह से हमें रोना नहीं आता 

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे 
पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले 

मस्जिद में उसने हमको आँखें दिखा के मारा 
काफ़िर की शोख़ी देखो, घर में खुदा के मारा 

हक़ ने तुझ को इक ज़बान दी और दिये हैं कान दो 
इस के ये मानी कहे इक और सुने इंसान दो 

ऐ शमआ तेरी उम्र-ए-तबी-ई है एक रात 
हँस कर गुज़ार दे इसे या रोकर गुज़ार दे 
(उम्र-ए-तबी-ई = प्राकृतिक आयु)


इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाये 'जौक़' पर दिल्ली की गलियां छोडकर 

क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब 
याँ जान ही बदन में नहीं नब्ज़ क्या चले 
(तबीब= चिकित्सक)

रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक ऐ' 'जौक़'
औलाद से तो है यही दो पुश्त चार पुश्त 

हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझ पर 
बल्कि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जाएँगे 

ना हुआ पर ना हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब 
'जौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा 

पिला मय अश्करा हमको किस की साक़िया चोरी 
खुदा से जब नहीं चोरी तो फिर बंदे से क्या चोरी 
(अश्करा = खुल्लमखुल्ला)

बाद रंजिश के गले मिलते हुये रुकता है दिल 
अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढ़ूँ कुछ तू बढ़े 

रिन्द-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू 

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