महात्मा और चूहा - लोक कथा | Mahatma aur Chuha - Lok Katha in Hindi

किसी घने जंगल के बीच एक बहुत पहुंचे हुए तपस्वी महात्मा रहते थे. उनकी छोटी सी कुटिया में एक दिन एक चूहा न जाने कहाँ से आ गया और वहीं रहने लगा. अब महात्माजी तो महात्मा ही ठहरे. वे उस छोटे से उत्पाती जीव को वहाँ से भगाने की बजाय उस पर स्नेह दिखाने लगे. नतीजा ये हुआ कि चूहा जो शुरू शुरू में उनसे थोडा बहुत डरता था, धीरे धीरे उनके नज़दीक आने लगा और एक दिन तो उसने डरना बिलकुल ही छोड़ दिया. अब तो वह जब चाहता तब उनकी गोद में चढ़ जाता या जब चाहे उनके कंधे पर जाकर बैठ जाता. महात्मा जी  चूहे की हरकतें देख देखकर हँसते रहते. 

महात्मा जी बड़े पहुंचे हुए तपस्वी और योगी थे. धीरे धीरे अपने योगबल से वे उस चूहे के मनोभावों को पढ़कर उससे बात करने में सक्षम हो गए. 

एक बार उस चूहे के मन में बलवान बनने की लालसा उत्पन्न हुई. वह बोला - "महाराज, चूहे का जीवन भी कोई जीवन है. हर वक़्त डर के साए में जीना पड़ता है. बिल्ली चूहे को कभी भी झपट्टा मारकर दबोच लेती है और मार कर खा जाती है. चूहे से कोई नहीं डरता."

महात्मा जी चूहे की  बात सुनकर मुस्कुराए, बोले - "तो तू चाहता क्या है ?"

चूहा बोला - "महाराज, कोई ऐसा उपाय करें जिससे मैं बिल्ली बन जाऊं !"

"बिल्ली बन कर क्या करेगा ?", महात्मा जी ने पूछा. 

"बिल्ली बनकर मुझे डर कर नहीं जीना पड़ेगा. फिर मैं बिल्लियों से लडूंगा और उनके द्वारा चूहों पर किया जा रहे अत्याचार का बदला लूँगा." चूहे ने जवाब दिया. 

महात्मा जी के पास तपोबल द्वारा अर्जित की हुई ऐसी शक्ति थी जिससे वे किसी जीव को दूसरे जीव में बदल सकते थे. फिर भी उन्होंने चूहे को बहुत समझाया कि केवल शक्ति होने से कोई निडर नहीं हो जाता, पर चूहा नहीं माना. 

आखिरकार उन्होंने कोई मंत्र बुदबुदाया और अपने कमंडल से अभिमंत्रित जल की कुछ बूँदें चूहे के ऊपर छिडकी. देखते ही देखते वह चूहा एक बड़ी सी काली बिल्ली में तब्दील हो गया. 

बिल्ली बनते ही चूहे ने एक अंगडाई ली और सबसे पहले अपने ही बिल की ओर झपटा. लेकिन वहाँ कोई चूहा न पाकर वह चूहों की तलाश में कुटिया से बाहर भाग गया. 

बिल्ली बनते ही वह बिल्लियों से बदले की बात भूल गया. अब वह हर वक़्त चूहों की तलाश में घूमता रहता. जहां भी कोई चूहा दिखता वह झपट्टा मार कर पकड़ता और मार कर खा जाता. उसके दिन मजे में बीत रहे थे फिर एक दिन उसकी मुलाक़ात कुछ कुत्तों से हो गई.  

उस दिन महात्मा जी ने देखा कि बिल्ली कुटिया की छत पर बैठी रो रही है. 

महात्माजी ने कारण पूछा तो कहने लगी - "महाराज, असली ताक़त तो कुत्ते के पास होती है, उसके आगे बिल्ली की कोई औकात नहीं. कुत्तों के डर के कारण मुझे अपने भोजन की तलाश में भी छिप छिप कर जाना पड़ता है. जरा सा खुले में निकली नहीं कि कुत्ते पीछे पड़ जाते हैं. ऐसे जीवन का क्या फायदा !"

महात्मा जी बोले - "मैं समझ गया, तू कुत्ता बनना चाहती है." और ऐसा कहकर उन्होंने कमंडल से फिर छींटे मारे और बिल्ली तुरंत कुत्ता बन गई. 

कुत्ता बनते ही कुछ दिन तो उसकी मौज रही. किसी भी छोटे मोटे जानवर को मारकर अपना पेट भर लेता और महात्मा जी की कुटिया के आसपास मंडराता रहता. पर एक दिन उसे शिकार नहीं मिला तो जरा गहरे जंगल में चला गया. 

जब लौटा तो बुरी तरह कराहते हुए और लंगड़ाते हुए आया. महात्मा जी ने पूछा - "तेरी यह हालत किसने की ?"

कुत्ता कहने लगा - "भालू ने महाराज, भालू ने ! वह बड़ा बलवान जानवर होता है, उसी ने मुझे पकड़ लिया. वो तो मेरा भाग्य अच्छा था कि मैं उसके चंगुल से छूट निकला वर्ना आज तो वह मुझे मारकर खा ही जाता."

महात्मा जी उसके घाव साफ़ करके मरहम पट्टी करने लगे तो वह कहने लगा - "महाराज, मरहम पट्टी करने से क्या फायदा ? वो भालू तो मुझे सूंघता सूंघता यहाँ भी आ सकता है और मुझे मारकर खा सकता है. अगर आप मेरी जान बचाना ही चाहते हैं तो मुझे भालू बना दीजिये फिर मैं उस भालू से अपना हिसाब खुद ही चुकता कर लूँगा और किसी से डरूंगा भी नहीं."

महात्मा जी कुछ कहना चाहते थे लेकिन कुत्ते ने रोना शुरू कर दिया. हार कर महात्मा ने उसके ऊपर फिर अभिमंत्रित जल छिड़का और उसे भालू बना दिया. 

भालू बनते ही सबसे पहले तो वह महात्मा जी पर ही गुर्राने लगा. अगर महात्मा जी में योगबल की शक्ति न होती तो वह उनका काम ही तमाम कर देता. किन्तु महात्मा जी पर अपना जोर न चलते देख वह जंगल में भाग गया. 

मगर उस जीव की शक्तिशाली बनने की पिपासा भालू बनकर भी शांत नहीं हुई. कुछ दिनों तक जंगल में रहने के बाद, एक दिन वह उदास मन से फिर महात्मा जी के पास आया और कहने लगा कि भालू के रूप में भी वह सुखी नहीं है. चीते, बाघ जैसे जानवरों से उसे डरकर रहना पड़ता है. 

महात्मा जी ने उसे चीता बनाया फिर बाघ बनाया पर वह संतुष्ट न हुआ. एक दिन आकर कहने लगा - "महाराज, मैंने देख लिया है, जंगल में सबसे शक्तिशाली जीव हाथी है. उसकी शक्ति की कोई सीमा नहीं. सब उससे डरते हैं. वह अपनी सूंड से कितने भी बड़े जानवर को पटक सकता है. आप मेरी अंतिम प्रार्थना मान लीजिये. मुझे हाथी बना दीजिये."

"सोच ले, फिर तो कुछ और बनने मेरे पास नहीं आएगा." महात्मा जी ने कहा. 

"नहीं महाराज अब कभी नहीं आऊंगा. बस एक बार मुझे हाथी बना दें." उसने अनुनय करते हुए कहा. 

महात्मा जी ने हँसते हुए मंत्र पढ़ा और उसे हाथी बना दिया. 

हाथी बनते ही वह चिंघाड़ता हुआ वन की ओर लौटा. जो भी जानवर सामने आया उसे सूंड में लपेटकर गेंद की तरह फेंक दिया. अब उसकी शक्ति का पार न था. जिधर से भी वह गुजरता, बड़े बड़े खतरनाक पशु  उसे देखते ही भाग खड़े होते. किसी में हिम्मत नहीं थी जो उसका सामना कर सके. देखते ही देखते जंगल में उसने अपना आतंक कायम कर लिया. 

और एक दिन, जब वह चिंघाड़ता हुआ, पेड़ों को उखाड़ता हुआ चला रहा था कि उसका पाँव एक गड्ढे में पड़ा और वह धडाम से उसमें गिर पड़ा. जैसे ही वह गड्ढे में गिरा, चारों तरफ से मनुष्यों की आवाजें आनी शुरू हो गईं और देखते ही देखते कई सारे मनुष्य अपने हाथों में हथियार और रस्से लिए उस गड्ढे के इर्दगिर्द आन खड़े हुए. 

ये सभी हाथी पकड़ने वाले शिकारी थे और उन्होंने ही यह गड्ढा खोदा था. जैसे ही हाथी गड्ढे से निकलने की कोशिश करता वे उसके ऊपर बरछे और डंडों से वार करते और वह फिर गड्ढे में गिर जाता. उसने बहुतेरी कोशिश की गड्ढे से निकलने की, और इन कोशिशों से उसे गंभीर चोटें भी आईं परन्तु वह उस गड्ढे से बाहर न निकल सका. 

हाथी दर्द और क्रोध से पागल सा हो रहा था. वह इतना शक्तिशाली जीव और ये पिद्दी से मनुष्य उस पर हावी हो रहे हैं, ये सोचकर उसे और गुस्सा आ रहा था किन्तु उसकी एक न चल पा रही थी. 

अंत में जब वह थककर निढाल हो गया तब शिकारियों ने गड्ढे की एक तरफ की दीवार को तोड़कर ढालू बनाया और फिर उसके पाँव अच्छी तरह से रस्सों में बांधकर, उसे जबरदस्ती खड़ा करके मारते मारते गड्ढे से बाहर ले गए. 

शिकारी उसे शहर ले जाना चाहते थे परन्तु वह इतना थका हुआ और घायल था कि चल ही नहीं पा रहा था इसलिए वह थोड़ी दूर चलने के बाद निढाल होकर गिर पड़ा. उधर शाम भी ढलने लगी थी इसलिए शिकारियों ने उसके पाँव में बंधे रस्सों को एक  मजबूत वटवृक्ष से जकड़ दिया ताकि होश में आने पर वह भाग न सके, और दूसरे दिन उसे ले जाने का विचार करके चले गए. 

हाथी को जब होश आया तब रात गहरा चुकी थी. भूख और पीड़ा अब उसकी सहनशक्ति से बाहर हो रही थी. वह पड़ा पड़ा सोच रहा था - "अगर मुझे ज्ञान होता कि हाथी से शक्तिशाली जीव शिकारी होता है तो मैं शिकारी बनता, हाथी क्यों बनता ! काश इस समय महात्मा जी को मेरी अवस्था का ज्ञान हो जाता तो वे अवश्य मेरी मदद करते."

वह इन्हीं विचारों में मग्न था कि सहसा उसे आभास हुआ कि उसके पिछले पैरों में खुजली सी हो रही है. अचानक उसे लगा कि खुजली उसके पैरों में एक स्थान से दूसरे स्थान को रेंग रही है. 

आकाश में चाँद अपने पूरे तेज से चमक रहा था. हाथी ने जरा सा सिर उठाकर अपने पैरों की ओर देखा तो वहां उसे एक चूहा नजर आया. उस छोटे से चूहे को देखकर हाथी को अपने हाल पर हंसी सी आई. आज ऐसी हालत है कि ये छोटा सा जीव भी उसके साथ खिलवाड़ कर रहा है. 

उसने एक बार फिर चूहे की ओर देखा. क्या देखता है कि चूहा उसके पाँव में बंधी रस्सी को बैठा बैठा कुतर रहा है. वह सांस रोके वैसा ही लेटा रहा. कुछ देर बाद उसे अहसास हुआ कि पाँव का बंधन कुछ ढीला सा हो गया है. चूहा रस्सी काट चुका था. 

उसने पैर को हिलाया तो रस्सी अलग जा गिरी. और पैर के हिलते ही चूहा भी नौ-दो ग्यारह हो गया. 

वह आजाद हो चुका था. उसने कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए चूहे को चारों ओर देखा, मगर वह न जाने कौनसे बिल में लापता हो चुका था. 

किन्तु चूहे को खोजने का उसके पास वक़्त नहीं था. पौ फटने लगी थी और शिकारी आते ही होंगे, यह सोचकर वह तुरंत वहाँ से चल पड़ा. 

वहाँ से वह सीधा महात्मा जी की कुटिया पर पहुंचा और बैठ गया. उसकी आँखों में आंसू थे. उसे देखकर महात्मा जी कुटिया से बाहर आये और बोले - "कहो गजराज, अब क्या है ? अब ये आंसू क्यों ?"

"महात्मा जी, ये हाथी का शरीर मुझे नहीं चाहिए," वह ग्लानि भाव से बोला. 

"तो अब क्या शिकारी बनने की इच्छा है ?" महात्मा जी ने हँसते हुए कहा, जो कि अपने तपोबल से सारी कहानी जान चुके थे. 

"नहीं महाराज, आप मुझे वापस चूहा ही बना दीजिये." उसने विनम्रता पूर्वक कहा. 

"क्या? इतने शक्तिशाली हाथी का रूप छोड़कर तुम चूहा बनना चाहते हो ?" महात्मा जी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा. 

"हाँ महाराज, मुझे ऐसी विध्वंस करने वाली शक्ति नहीं चाहिए. मुझे ऐसी शक्ति चाहिए जिससे औरों के बंधन काट सकूँ."  

महात्मा जी ने हँसते हँसते फिर उसके ऊपर जल छिड़का और पलक झपकते ही वह वापस चूहा बन गया और उछलता कूदता कुटिया के भीतर अपने बिल में चला गया. 




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