सफ़ेद हाथी - बर्मा की लोककथा | Safed Haathi - Burma ki Lokkatha

 बहुत पुरानी बात है. बर्मा के किसी शहर में, औंग नाम का एक धोबी और नारथु नाम का एक कुम्हार अडोस-पड़ोस में रहते थे. औंग अपने काम में बहुत ही होशियार था. उसके हाथ के धुले कपड़ों की चर्चा शहर भर में होती थी. शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति, यहाँ तक कि राजा के कपडे भी उसी के यहाँ धुलने आते थे. लोग कहते थे कि वह 'जादुई धुलाई' करता है क्योंकि उसके हाथ लगते ही कपडे नए जैसे हो जाते थे. 

सचाई ये थी कि औंग कोई जादू नहीं करता था बल्कि उसकी कड़ी मेहनत ही उसकी सफलता की कुंजी थी. वह अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन से करता था. वह एक सफल धोबी था और अपने व्यवसाय से काफी धनवान हो गया था. 

पडोसी नारथु कुम्हार औंग की सफलता से बहुत ईर्ष्या करता था. वह था भी परले दर्जे का आलसी. औंग के मुकाबले उसके काम के कद्रदान बहुत कम थे और इसी कारण उसके पास धन की कमी हमेशा बनी रहती थी. वैसे तो काम में दिन भर वह भी खटता था लेकिन मन से मेहनत नहीं करता था. इस कारण उसके बनाए मिटटी के बर्तनों की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं होती थी और फलतः वह अधिक धन नहीं कमा पाता था. 

वह अपने काम के बारे में न सोचकर अक्सर औंग के पतन की कामना किया करता. एक बार उसने औंग की प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए एक साजिश रची. उसने राजा को भेंट देने के लिए एक शानदार मिटटी का बरतन बनाया और उसे लेकर महल में पहुँच गया. 

जब उसे राजा के सामने ले जाया गया तब उसने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा - "महाराज, आप एक महान राजा है, आपके महल में जो भी चीज़ है वह सर्वोत्तम है. आपका सिंहासन, आपका मुकुट, आपका सुनहरा छत्र सबकुछ उत्तम है. इसीलिए मैं आपके लिए अपने हाथों से बनाकर ये सुन्दर मिटटी का पात्र लाया हूँ. इसे स्वीकार कीजिये."

राजा को प्रशंसा बहुत पसंद थी. वह नारथु की बातों से खुश हुआ. भेंट स्वीकार करते हुए बोला - "जरा महल में और नजर फैलाकर देखो .... कहीं किसी चीज़ में कमी हो तो मुझे बताओ."

नारथु तो इसी मौके की तलाश में महल में गया था. उसने राजा की आज्ञानुसार महल में चारों तरफ नजर दौड़ाई और बोला - "महाराज, आपके महल में मौजूद हर चीज़ दुनिया में सर्वोत्तम है. कहीं कोई कमी नजर नहीं आती....  बस एक चीज़ को छोड़कर !"

राजा चौंककर तुरंत बोला - "कौन सी चीज़ में कमी है. फ़ौरन बताओ ?"

थोड़ी दूर पर बंधे राजा के हाथी की ओर इशारा करते हुए नारथु बोला - "बस आपका ये हाथी जरा मटमैले रंग का है .... अगर ये भी एकदम उजला सफ़ेद रंग का होता तो महल की सुन्दरता में चार चाँद लग जाते !"

नारथु की बात सुनकर राजा का मन खिन्न हो उठा. बोला - "अब हाथी तो ऐसे ही रंग के होते हैं .... सफ़ेद हाथी हमारे जंगलों में कहीं पाए ही नहीं जाते तो कहाँ से लायें ?"

"सफ़ेद हाथी लाने की क्या जरूरत है महाराज ? आपका यही हाथी दूध जैसा उज्जवल हो सकता है ?" नारथु तपाक से बोला. 

"वो कैसे ?" राजा ने उत्सुकता से पूछा. 

"अरे मेरा पडोसी औंग है न महाराज, जो जादुई धुलाई करता है ! वो कैसे भी गंदे कपड़ों को हाथ लगाते ही एकदम उज्जवल धवल कर देता है तो हाथी क्योंकर मटमैला रहेगा ? आप एक बार औंग के हाथ से इस हाथी को नह्लाइये धुलवाइए तो सही ! मुझे पूरा विश्वास है कि औंग अपने हाथों के जादू से इस हाथी को दूध जैसा सफ़ेद कर देगा."

नारथु की बात राजा को जंच गई. उन्होंने तुरंत औंग को बुलवा भेजा. जब राजा ने औंग से मटमैले हाथी को सफ़ेद बनाने के लिए कहा तो औंग चक्कर में पड़ गया. ये किस तरह की मांग है ? भला हाथी कोई कपड़ा है जिसे धोकर उजला किया जा सकता है ? तभी उसने अपने पडोसी नारथु को वहाँ खड़े देखा तो वह तुरंत समझ गया कि यह आग इस ईर्ष्यालु आदमी ने ही लगाईं है. 

किन्तु अब औंग बेचारा करे तो क्या करे ? वह राजा को मना नहीं कर सकता था. मना करने का अर्थ था राजा के कोप का भाजन बनना. और यदि वह इस काम के लिए हाँ करता है तो भी उसकी प्रतिष्ठा धूमिल होने से नहीं बच सकती क्योंकि मटमैला हाथी तो सफ़ेद होने से रहा. 

वह कुछ देर विचारमुद्रा में खड़ा रहा फिर अचानक उसके दिमाग में एक युक्ति कौंधी. उसे नारथु को सबक सिखाने का रास्ता सूझ गया. हाथ जोड़कर राजा से बोला - "महाराज, आपकी आज्ञा शिरोधार्य ! मैं हाथी को सफ़ेद बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करूंगा. किन्तु इस काम के लिए मुझे एक चीज़ चाहिए होगी जो मेरे पास नहीं है."

राजा तुरंत बोला - "तुम्हें क्या चाहिए जल्दी बोलो ? जो तुम चाहोगे वो मैं तुम्हें दूंगा."

औंग बोला - "महाराज, मैं हाथी को सफ़ेद बनाने के लिए जादुई साबुन बनाऊँगा जिससे उसे नहलाऊँगा. नहलाते ही हाथी सफेद हो जाएगा. किन्तु उस जादुई साबुन का प्रयोग किसी मिटटी के पात्र में ही हो सकता है. यदि आप एक हाथी के खड़े होने लायक बड़ा सा मिटटी का पात्र बनवा सकें जिसमें मैं साबुन भर कर हाथी को बैठाकर नहला सकूँ, तो ये काम संभव है !"

अब राजा ने नारथु की ओर देखा और कहा - "ये काम तुम करोगे. तुमसे अच्छा मिटटी का पात्र और कौन बना सकता है ? आखिर तुम मेरे लिए कितनी शानदार भेंट लाये हो."

यह सुनते ही नारथु सकपका गया. वह तो आया था औंग को फंसाने, किन्तु औंग ने उलटा उसे ही फंसा दिया. परन्तु अब किया ही क्या जा सकता था ? राजा को मना करने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी. बुझे मन से बोला - "जी महाराज, जैसी आपकी आज्ञा ... मैं बड़ा सा मिटटी का पात्र बनाता हूँ."

अब हाथी को बैठाने लायक बड़ा मिटटी का पात्र बनाना उसके अकेले के बस का काम तो था नहीं. उसने अपने सारे रिश्ते-नातेदार बुला लिए. मिटटी इकट्ठी की और पात्र बनाने में लग गया. करीब एक महीने की मेहनत के बाद मिटटी का पात्र तैयार हो गया. एक बड़ी सी गाडी में चढ़ाकर वह पात्र राजा के महल में पहुंचाया गया. 

अंततः वो दिन आ गया जिस दिन हाथी को नहलाया जाना था. औंग बड़े बड़े बर्तनों में साबुन का घोल भरकर लाया और उसे नारथु द्वारा बनाए गए मिटटी के पात्र में उंडेलता गया. जब सारा साबुन उंडेला जा चुका तब हाथी को लाया गया. 

राजा और तमाम जनता यह सब दृश्य देखने को एकत्रित हो ही चुके थे. सब औंग का कमाल देखने को लालायित थे. मटमैला हाथी सफ़ेद होने वाला था. 

लेकिन यह क्या ? जैसे ही हाथी को नहलाने के लिए  लाया गया और उसने मिटटी के पात्र में अपना पैर रखा, वजन पड़ते ही पात्र कड़कड़ाकर कई भागों में टूट गया और सारा साबुन जमीन पर बह गया. 

औंग चिल्लाया - "अनर्थ हो गया महाराज ! मैंने अपनी सारी जादुई शक्तियों का प्रयोग करके ये साबुन बनाया था सारा का सारा बह गया, व्यर्थ हो गया ! अब मैं हाथी को सफ़ेद नहीं कर सकता महाराज !"

उधर पात्र के टूटते ही नारथु का मुँह देखने लायक हो गया और राजा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया - "इस आदमी को मेरे राज्य से बाहर निकाल दो ... !" राजा चिल्लाया. 

फिर क्या था ? ईर्ष्यालु नारथु अपनी गति को प्राप्त हुआ और उसको देश-निकाला दे दिया गया. औंग प्रसन्नतापूर्वक अपने घर आया और अपने काम में लग गया. 

(A Burmese Folk Tale, Burma Ki Lok Katha in Hindi)




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